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________________ गा० २२] उत्तरपयडिपदेसविहत्तीए कालपरूवणा ___३३. देवगईए देवेमु मिच्छत्तित्थि-णqसयवेदाणं जह० पदे० जहण्णुकस्स० एगस० । अज० जह० दसवस्ससहस्साणि, उक्क० तेत्तीसं सागरोवमाणि । एवमणंताणु०चउक्कल-सम्म०-सम्मामिच्छत्ताणं । णवरि अज० जह० एगस०। बारसक०भय-दुगुंछाणं मिच्छत्तभंगो । पंचणोक० जह० पदे० जहण्णुक० एगस० । अज० जह. अंतोमुहु०, उक्क० तेत्तीसं सागरोवमाणि । ३४. भवणादि जाव उवरिमगेवज्जा ति मिच्छत्तित्थि-णqसयवेदाणं जह. पदे० जहण्णुक्क० एगस०। अज. जह० जहण्णहिदी, उक्क० उक्कस्सहिदी । सम्पत्त-सम्मामि०-अणंताणु०चउक्काणं जह० पदेस० जहण्णुक्क० एगस० । अज० जह० एगस०, उक्क० उक्क हिदी । बारसक-भय-दुगुंछाणं जह० पदे० जहण्णुक्क. एगस० । अज० जह० जहण्णहिदी समयूणा, उक्क. उक्कस्सहिदी। पंचणोक. प्रमाण है यह स्पष्ट ही है। मात्र सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना होकर अभाव न हो जाय ऐसा करते हुए उनका सत्त्व बनाये रखना चाहिए। ३३. देवगतिमें देवोंमें मिथ्यात्व, स्त्रीवेद और नपुंसकवेदकी जघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। इनकी अजघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य काल दस हजार वर्ष है और उत्कृष्ट काल तेतीस सागर है। इसी प्रकार अनन्तानुबन्धीचतुष्क, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके विषयमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनकी अजघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य काल एक समय है। बारह कषाय, भय और जुगुप्साका भङ्ग मिथ्यात्वके समान है। पाँच नोकषायोंकी जघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। अजघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल तेतीस सागर है । विशेषार्थ देवोंमें स्वामित्वको देखते हुए मिथ्यात्व, बारह कषाय, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, भय और जुगुप्साकी अजघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य काल दस हजार वर्ष और उत्कृष्ट काल तेतीस सागर बन जाता है, इसलिए यह काल उक्त प्रमाण कहा है। सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क और पाँच नोकपायोंकी अजघन्य प्रदेशविभक्तिका उत्कृष्ट काल भी इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। मात्र इनके अजघन्य प्रदेशसत्कर्मके जघन्य कालमें अन्तर है, इसलिए वह अलगसे कहा है। उनमेंसे प्रारम्भकी छह प्रकृतियोंकी अजघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य काल एक समय तो मनुष्योंके समान यहाँ भी घटित हो जाता है। मात्र पाँच नोकषायोंकी जघन्य प्रदेशविभक्ति देवोंमें उत्पन्न होनेके अन्तर्मुहूर्तबाद सम्भव है, इसलिए यहाँ इनकी अजघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त कहा है। ६३४. भवनवासियोंसे लेकर उपरिम वेयक तकके देवोंमें मिथ्यात्व, स्त्रीवेद और नपुंसकवेदकी जघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। अजघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य काल अपनी अपनी जघन्य स्थितिप्रमाण है और उत्कृष्ट काल अपनी अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण है । सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी जघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। अजघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अपनी अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण है। बारह कषाय, भय और जुगुप्साकी जघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। अजघन्य प्रदेशविभक्तिका जघन्य काल एक समय कम अपनी अपनी जघन्य स्थितिप्रमाण है Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001413
Book TitleKasaypahudam Part 07
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages514
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size13 MB
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