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________________ ४, २, १२, ४. ] अतर विहाणाणियोगद्दारं [ ३७१ विदियसमए विसिं पोग्गलाणं बंधो चेव, तदियसमये वि बंधो चेव, एवं बंधस्स णिरंतरभावो बंधपरंपरा णाम । ताए बंधा परम्परबंधा त्ति दट्ठव्वा । गम-ववहाराणं णाणावरणीयवेयणा अणंतरबंधा' ॥ २ ॥ कुदो ? बंधपढमसमए चैव जीवस्स परतंतभावुप्पायणेण वेयणभावुवलंभादो उदिष्णदव्वादो बज्झमाणदव्वस्स भेदाभावादो वा बज्झमाणदव्वस्स णाणावरणीयवेयणभावो जुज्जदे | ण च अवस्थाभेदेण दव्वभेदो अस्थि, दव्वादो पुधभद अवत्थाणुवलंभादो । परंपरबंधा ॥ ३ ॥ परंपरबंधाविणणावरणीयवेयणा होदि । कुदो ? बंधविदियादिसमएस हिदकम्मक्खंधाणं उदिष्णकम्मक्खंधेहिंतो दव्वदुवारेण एयत्तुवलंभादो । तदुभयबंधा ॥ ४ ॥ णाणावरणीय वेणा तदुभयबंधा वि होदि, जीवदुवारेण दोष्णं पि' णाणावरणीयघाणमेव भादो | बंधोदय- संताणं वेयणाविहाणं वेयणावेयणविहाणे चेव परूदिदं शंका- बन्धकी परम्परा कैसे सम्भव है ? समाधान- प्रथम समय में बन्ध हुआ, द्वितीय समय में भी उन पुद्गलोंका बन्ध ही है, तृतीय समय में भी बन्ध ही है, इस प्रकारसे बन्धकी निरन्तरताका नाम बन्धपरम्परा है । उस परम्परासे होनेवाले बन्धोंको परम्पराबन्ध समझना चाहिये । नैगम और व्यवहार नयकी अपेक्षा ज्ञानावरणीयवेदना अनन्तरबन्ध है || २ ॥ कारण कि बन्धके प्रथम समयमें ही जीवकी परतन्त्रता उत्पन्न करानेके कारण उसमें वेदनाव पाया जाता है । अथवा, उदीर्ण द्रव्यकी अपेक्षा बध्यमान द्रव्यमें चूँकि कोई भेद नहीं है, इसलिये इन दोनों नयोंकी अपेक्षा बध्यमान द्रव्यको ज्ञानावरणीयके वेदनास्वरूप मानना समुचित है । यदि कहा जाय कि अवस्थाभेदसे द्रव्यका भी भेद सम्भव है, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि, [ इन नयोंकी दृष्टिमें ] द्रव्यसे पृथग्भूत अवस्था नहीं पायी जाती है । वह परम्पराबन्ध भी है ॥ ३ ॥ ज्ञानावरणीयवेदना परम्पराबन्ध भी है, क्योंकि, बन्धके द्वितीयादिक समयों में स्थित कर्मोंकी उदीर्ण कर्मस्कन्धों के साथ द्रव्यके द्वारा एकता पायी जाती है । वह तदुभयबन्ध भी है ॥ ४ ॥ ज्ञानावरणीयवेदना तदुभयबन्ध भी है, क्योंकि, जीवके द्वारा दोनों ही ज्ञानावरणीय बन्धों के एकता पायी जाती है । बन्ध, उदय और सत्त्वके वेदनाविधानकी प्ररूपणा चूँकि वेदनावेदनविधानमें ही की जा चुकी है, अतएव इन सूत्रों का यह अर्थ नहीं है; इसलिये इनके अर्थकी १ ताप्रतौ 'बद्धा' इति पाठः । २ श्राकाप्रतिषु 'वा' इत्येतत्पदं नोपलभ्यते । ३ ताप्रतौ 'बद्ध' इवि पाठः । ४ अ श्राकाप्रतिषु 'वि' इति पाठः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001406
Book TitleShatkhandagama Pustak 12
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
AuthorHiralal Jain, Fulchandra Jain Shastri, Devkinandan, A N Upadhye
PublisherJain Sahityoddharak Fund Karyalay Amravati
Publication Year1955
Total Pages572
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size13 MB
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