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________________ ४, २, ६, ९. ] वैयणमहाहियारे वैयणकाल विहाणे सामित ( १०१ तत्थ द्विदीणमायामस्स घादाभावादो । पुणो तेणेव बिदियफालीए अवणिदाए उक्कीरणद्धा बिदियसमओ गलदि । एदमपुणरुत्तट्ठाणं होदि । तदियफालीए अवणिदाए उक्कीरणद्धा तदियसमओ गलदि । एदं अपुणरुत्तट्ठाणं होदि । एवं समऊणुक्कीरणद्धामेत्ताणि चैव द्वाणाणि अपुणरुताणि उप्पादेदव्वाणि । पुणो उक्कीरणद्धा चरिमसमएण ट्ठिदिकंदयचरिमफालिं तधा चैव दृविय पुणो देसु अप्पिदजीवसु सव्वुक्कस्सट्ठिदिसंतकम्मियजीवेण तदियट्ठिदिकंदयपढमफालीए अवणिदाए उक्कीरणद्धाए पढमसमओ गलदि । एदं पुणरुतट्ठाणं होदि । बिदियफालीए अवणिदाए उक्कीरणद्धाए बिदियसमओ गलदि । एदं पि पुणरुत्तट्ठाणं । तदियफालीए अवणिदाए उक्कीरणद्धाए तदियसमओ गलदि । एदं पि पुणरुत्तट्ठाणं होदि । एवं समऊणुक्कीरणद्धामेत्ताणि पुणरुत्तट्ठाणाणि गच्छति । पुणो तदियट्ठिदिखंडयस्स चरिमफालीए अवणिदाए उक्कीरणद्धाए चरिमसमओ गलदि । एदमपुणरुत्तट्ठाणं होदि । कुदो ? चरमफालीए अवणिदाए सेसट्ठिदिसंतकम्मस्स पुव्विल्लडिदिसतकम्मेण सरिसत्तं पत्तस्स अघट्ठिदिगलणेणे समऊण त्तदंसणादो । पुणो म्हादो बिदियजीवेण तदियडिदिखंडयस्स पढमफालीए अवणिदाए उक्की - स्थान नहीं उत्पन्न होता, क्योंकि, उनमें स्थितियोंके आयामका घात सम्भव नहीं है । पश्चात् उसी जीवके द्वारा द्वितीय फालिके अलग किये जानेपर उत्कीरणकालका द्वितीय समय गलता है यह अपुनरुक्त स्थान है । तृतीय फालिके अलग होनपर उत्कीरणकालका तृतीय समय गलता है । यह अपुनरुक्त स्थान है । इस प्रकार एक समय कम उत्कीरणकाल प्रमाण ही अपुनरुक्त स्थानोंको उत्पन्न कराना चाहिये । अब उत्कीरणकालके अन्तिम समयमें स्थितिकाण्डककी अन्तिम फालिको उसी प्रकार स्थापित करके फिर इन विवक्षित जीवों में से सर्वोत्कृष्टस्थितिसत्कर्मिक जीवके द्वारा तृतीय स्थितिकाण्डककी प्रथम फालिके विघटित किये जानेपर उत्कीरणकालका प्रथम समय गलता है । यह पुनरुक्त स्थान है । द्वितीय फालिके विघटित किये जानेपर उत्कीरणकालका द्वितीय समय गलता है । यह भी पुनरुक्त स्थान है । तृतीय फालिके विघटित होनेपर उत्कीरणकालका तृतीय समय गलता है । यह भी पुनरुक्त स्थान है । इस प्रकार एक समय कम उत्कीरणकालके बराबर पुनरुक्त स्थान जाते हैं। पश्चात् तृतीय स्थितिकाण्डककी अन्तिम फालिके विघटित होने पर उत्कीरणकालका अन्तिम समय गलता है । यह अपुनरुक्त स्थान है, क्योंकि, अन्तिम फालिके विघटित होनेपर शेष स्थितिसत्कर्म पूर्वके स्थितिसत्कर्मसे समानताको प्राप्त स्थितिसत्कर्म अधःस्थितिके गलने से एक समय कम देखा जाता है । तत्पश्चात् इससे दूसरे जीवके द्वारा तृतीय स्थितिकाण्डककी प्रथम फालिके ९ प्रतिषु ' अवट्टिदिगलणेण ' इति पाठः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001405
Book TitleShatkhandagama Pustak 11
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
AuthorHiralal Jain, Balchandra Shastri, A N Upadhye
PublisherJain Sahityoddharak Fund Karyalay Amravati
Publication Year1995
Total Pages410
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size10 MB
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