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________________ १, २, ५, ७६ ] वेयणमहाहियारे वेयणदत्वविहाणे सामित्त [३०३ एवं छेदभागहारो चैव होदूण गच्छदि जाव उवरिमएगरूवधरिदं रूवूणुक्कस्सअसंखेज्जासंखेज्जेण खंडिदण तत्थ रूवूणमेगखंड वडिदेत्ति । पुणो संपुण्णे खंडे वडिदे समभागहारो होदि । एवं छेदभागहार-समभागहारसरूवेण ताव भागहारो गच्छदि जाव तप्पाबोग्गपलिदोवमस्स असंखेज्जदिमागं पत्तो त्ति । पुणो एदेण जहण्णदव्वे भागे हिदे एगसमयमोकडिदूण खीणकसायचरिमसमयादो हेट्ठा पक्खिविय विणासिदव्यमागच्छदि । पुणो एवं वड्डिद्ण विदो च, अण्णेगो जीवो जद्दण्णसामितविधाणेणागंतूण समऊण. पुवकोडिं संजममणुपालिय खवणाए अब्भुट्ठिय तदो खीणकसायचरिमसमए एगणिसगमेगसमयकालं धरिदूण विदो च, सरिसा । पुणो पुविल्लखवगं मोत्तूण समऊणपुग्धकोडिसंजमखवगं घेतण परमाणुतर-दुपरमाणुत्तरकमेण अणतभागवड्डि-असंखेज्जमागवडीहि एगसमयमोकड्डिदण खीणकसायचरिमसमयादो हेवा पक्खिविय विणासिददव्वं वढावेदग्वं । एवं वडिदूण ठिदो च, तदो अण्णेगो खवगो दुसमऊणपुवकोर्डि संजममणुपालिय खीणकसायचरिमसमए ठिदो च, सरिसा । एवमेगेगसमयमोकड्डिदूण विणासिददव्वं वड्ढावेदूण पुवकोडिं तिसमऊण चदुसमऊणादिकमेण ऊणं संजदगुणसेडिं कराविय ओदारेदध्वं जाप ही बना रहता है जब तक उपरिम एक विरलनके प्रति प्राप्त राशिको उत्कृष्ट असंख्याता. संख्यातसे खण्डित कर जो लब्ध आवे उनमेंसे एक कम एक खण्ड नहीं बढ़ जाता। पश्चात् सम्पूर्ण खण्डके बढ़नेपर समभागहार होता है। इस प्रकार छेदभागहार भोर समभागहार स्वरूपसे भागहार तब तक रहता है जब तक कि तत्प्रायोग्य पल्योपमका असंख्यातवां भाग प्राप्त होता है। पश्चात् इसका जघन्य द्रव्यमें भाग देनेपर एक समय कम कर और क्षीणकषायके अन्तिम समयसे नीचे लाकर नाशको प्राप्त हुआ द्रव्य आता है। पुनः इस प्रकार वृद्धिको प्राप्त होकर स्थित हुभा जीव, तथा अन्य एक जीव जो जघन्य स्वामित्वके विधानसे आकर एक समय कम पूर्वकोटि तक संयमका पालन कर क्षपणामें उद्यत होकर क्षीणकषायके अन्तिम समयमै एक समय कालवाले एक निषेकको धरकर स्थित है, ये आपसमें समान हैं। पुनः पूर्वोक्त क्षपकको छोड़कर एक समय कम पूर्वकोटि तक संयमको पालनेवाले क्षपकको ग्रहण कर एक परमाणु अधिक दो परमाणु अधिकके क्रमसे अनन्तभागवृद्धि और असंख्यात. भागवृद्धिके द्वारा एक समय कम कर क्षीणकषायके अन्तिम समयसे नीचे लाकर विनाशको प्राप्त हुए द्रव्यको बढ़ाना चाहिये। इस प्रकार वृद्धिको प्राप्त होकर स्थित हुआ जीव, तथा अन्य एक क्षपक जो दो समय कम पूर्वकोटि तक संयमका पालनकर क्षीणकषायके अन्तिम समयमें स्थित है, आपसमें समान हैं। इस प्रकार एक एक समय कम करते हुए विनाशित द्रव्यको बढ़ाकर तनि समय कम व चार समय कम भादिके क्रमसे हीन पूर्षकोत तक संयमगुणश्रेणि कराकर उतारना चाहिये अब Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001404
Book TitleShatkhandagama Pustak 10
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
AuthorHiralal Jain, Fulchandra Jain Shastri, Devkinandan, A N Upadhye
PublisherJain Sahityoddharak Fund Karyalay Amravati
Publication Year1954
Total Pages552
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size13 MB
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