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________________ १, २, १४. दव्वपमाणाणुगमे ओघ-अप्पबहुत्तपरूवणं [११५ कादव्वं । तं जहा, वत्तइस्सामो- सगअवहारकालेण पलिदोवमे भागे हिदे सासणसम्माइद्विरासी आगच्छदि । विगुणिदअवहारकालेण पलिदोवमे भागे हिदे सासणसम्माइडिरासिस्स दुभागो आगच्छदि । तिगुणिदअवहारकालेण पलिदोवमे भागे हिदे सासणसम्माइट्ठिरासिस्स तिभागो आगच्छदि। एवं ताव दुगुणादिकरणं कादव्यं जाव सासणसम्माइटिअवहारकालस्स अद्धच्छेदणयमेत्तवारा गदा ति । तत्थ अंतिमवियप्पं वत्तइस्सामो । सासणसम्माइहि-अवहारकालस्स अद्धच्छेदणए विरलेऊण विगं करिय अण्णोण्णब्भासे कदे सासणसम्माइद्विरासिस्स अवहारकालो होदि । तेण अवहारकालेण सासणसम्माइहि. रासिस्स अवहारकाले गुणिदे गुणगारपडिभागो होदि । सासणसम्माइट्ठिदव्वादो पलिदोवममसंखेज्जगुणं । को गुणगारो ? सग-अवहारकालो । एवं सम्मामिच्छाइहि असंजदसम्माइटि-संजदासंजदाणं च अप्पाबहुगं वत्तव्यं । पमत्तसंजदादीणं सत्थाणप्पाबहुगं णत्थि, तेसिमवहारकालाभावादो। यहां पर प्रतिभागका प्रमाण निकालनेके लिये द्विगुणादिकरण विधि करना चाहिये। वह जिसप्रकार है आगे उसीको बतलाते हैं- अपने अवहारकालसे पल्योपमको भाजित करने पर सासादनसम्यग्दृष्टि जीवराशिका प्रमाण आता है (६५५३६ : ३२ = २०४८ सा.) द्विगुणित अवहारकालसे पल्योपमको भाजित करने पर सासादनसम्यग्दृष्टि जीवराशिका दूसरा भाग आता है (६५५३६ : ६४ = १०२४)। त्रिगुणित अवहारकालसे पल्योपमके भाजित करने पर सासादनसम्यग्दृष्टि जीवराशिका तीसरा भाग आता है (६५५३६ : ९६ = ६८२३ )। इसप्रकार जबतक सासादनसम्यग्दृष्टिसंबन्धी अवहारकालके अर्धच्छेदोंका जितना प्रमाण हो उतनेवार द्विगुणादिकरण विधि हो जावे तबतक यह विधि करते जाना चाहिये। वहां अब अन्तिम विकल्पको बतलाते हैं- सासादनसम्यग्दृष्टि जीवराशिसंबन्धी अवहारकालके अर्धच्छेदोंको विरलित करके और उसको दो रूप करके परस्पर गुणा करने पर सासादनसम्यग्दृष्टि जीवराशिके अवहारकालका प्रमाण होता है। इस अवहारकालसे सासादनसम्यग्दृष्टि जीवराशिके अपहारकालको गुणित करने पर गुणकारप्रतिभागका प्रमाण आता है। उदाहरण-सासादनसम्यग्दृष्टि अपहारकाल ३२, अर्धच्छेद ५, २ २ २ २= ३२, ३२४३२ % १०२४ गुणकार प्रतिभाग. सासादनसम्यग्दृष्टिके द्रव्यसे पल्योपम असंख्यातगुणा है । गुणकार क्या है ? अपना अर्थात् सासादनसम्यग्दृष्टिका अवहारकाल गुणकार है (२०४८४३२ = ६५५३६ पल्योपम)। इसीप्रकार सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयतोंके अल्पबहुत्वका कथन करना चाहिये । प्रमत्तसंयत आदिका स्वस्थान अल्पबद्दुत्व नहीं पाया जाता है, क्योंकि, उनका अवहारकाल नहीं है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001397
Book TitleShatkhandagama Pustak 03
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
AuthorHiralal Jain, Fulchandra Jain Shastri, Devkinandan, A N Upadhye
PublisherJain Sahityoddharak Fund Karyalay Amravati
Publication Year1941
Total Pages626
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size15 MB
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