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________________ १५० महाबंधे पदेसबंधाहियारे भागाभागाणुगमो १७०. 'मिस्स० भंगो । एवं एदेण बीजपदेण यावं अणाहारग त्ति णेदव्वं । परिमाणाणुगमो १७१. परिमाणं दुवि०-ओघे० आदे० । ओघे० पंचणा-छदसणा०-अट्ठक०भय-दुगुं०-तेजा०-क०-वण्ण०४-अगु०-उप०-णिमि०-पंचंत० भुज-अप्पद०-अवढि० कैंत्तिया ? अणंता । अवत्त० कॅत्तिया ? संखेजा। थीणगिद्धि०३-मिच्छ०-अट्ठक०ओरालि. तिण्णि पदा केत्तिया ? अणंता । अवत्त० केत्तिया ? असंखेजा । तिण्णिआउ० कालतक और आगे-पीछे अन्तर्मुहूर्त कालतक इनका निरन्तर बन्ध होता है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर कहा है। औदारिकशरीरका उत्तम भोगभूमिमें कुछ कम तीन पल्यतक बन्ध नहीं होता, इसलिए इनके भुजगार और अल्पतरपदका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य कहा है। तथा इनके अवस्थित और अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर ओघमें जो कहा है वह यहाँ भी बन जाता है, इसलिए इसे ओघके समान जाननेकी सूचना की है । समचतुरस्रसंस्थान आदि पाँच प्रकृतियोंके तीन पदोंका भङ्ग ज्ञानावरणके समान घटित हो जाता है,यह स्पष्ट ही है। तथा उत्तम भोगभूमिमें कुछ कम तीन पल्यतक इनका निरन्तर बन्ध होता रहता है, इसलिए इनके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है । औदारिकशरीर अङ्गोपाङ्गका अन्य सब विकल्प औदारिक शरीरके समान घटित हो जाता है। मात्र अवक्तव्यपदके उत्कृष्ट अन्तरकालमें फरक है। बात यह है कि इसका सातवें नरकमें तो निरन्तर बन्ध होता ही है । तथा वहाँ जानेके पूर्व और निकलनेके बाद भी अन्तर्मुहूर्त कालतक बन्ध होता रहता है, इसलिए इसके अवक्तव्यपदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर कहा है। नीचगोत्रके तीन पदोंका भङ्ग नपुंसकवेदके समान बन जानेसे वह उसके समान कहा है और अवक्तव्यपदका भङ्ग ओघके समान बन जानेसे उसे ओघके समान जाननेको सूचना की है। ___ भागाभागानुगम १७०.........मिश्रके समान भङ्ग है। इसप्रकार इस बीजपदके अनुसार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए। परिमाणानुगम १७१. परिमाण दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, आठ कषाय, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण और पाँच अन्तरायके भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपदवाले जीव कितने हैं ? अनन्त हैं। अवक्तव्यपदवाले जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, आठ कषाय और औदारिकशरीरके तीन पदोंके बन्धक जीव कितने हैं अनन्त हैं । इनके अवक्तव्यपदके बन्धक जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं । तीन आयु और वैक्रियिकषटकके भुजगार, अल्पतर अव ------- १ता०प्रतौ 'ओरालि० भुज अप्पज० ए० उ० ति०......... अत्र ताड़पत्रद्वयं विनष्टम् । एक क्रमांकरहितं ताड़पत्रं विद्यते ]...मिस्सभंगो । एवं एदेण बोज़ेण याव' आ०प्रतौ 'ओरालि. भुज.अप्प० जह. एग०, उक्क०........................मिस्सभंगो। एदेण बीजपदेण याव' इति पाठः । अत्र आ०प्रतौ 'यहाँसे २०८ ताडपत्र नहीं है।' इत्यपि सूचना विद्यते । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001394
Book TitleMahabandho Part 7
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages394
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size9 MB
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