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________________ २३८ महाबंधे पदेसबंधाहियारे णिमि० णि. बं. णि० संखेंअदिभागूणं । समचदु०-पसत्थ०-सुभग-सुस्सरआदें. सिया० तंन्तु० संखेंजदिमागूणं बं । एवं पंचिंदि०तिरिक्ख०३ । ३७२. पंचिंदियतिरिक्खअपज० आभिणि• उक्क० पदे०५० चदुणा०-णवदंस०मिच्छ०-सोलसक०-भय-दु०-पंचंत० णि०० णि० उक्क० । दोवेदणी-सत्तणोक० आदाव-दोगो० सिया० उक० । दोगदि-पंचजादि-छस्संठा०-ओरालि० अंगो०-छस्संघ०दोआणु०-पर-उस्सा०-उजो०-दोविहा०-तसादिदसयुग. सिया० तं० तु. संखेंजदि भागूणं वं। ओरालि०-तेजा०-क०-वण्ण०४-अगु० उप०-णिमि० णि.4 णि. तंतु० संखेंजदिमागूणं बं० । एवं चदुणा०-णवदंस०-दोवेद०-मिच्छ०-सोलसक०सत्तणोक०-णीचा०-पंचंत. ३७३. इत्थि० उक० पदे०बं० पंचणा०-णवदंस०-मिच्छ०-सोलसक०-भय-दु०पंचंत० णि० बं० णि० उक० । दोवेद०-चदुणोक०-दोगोद० सिया० उक्क० । दोगदिहुंडसं०-असंपत्त०-दोआणु०-उजो०-थिरादितिण्णियुग०-दूभग-अणार्दै सिया० संखेंजदिनियमसे संख्यातभागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है । समचतुरस्रसंस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर और आदेयका कदाचित् बन्ध करता है। यदि बन्ध करता है तो इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी करता है और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी करता है। यदि अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है तो इनका नियमसे संख्यातभागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। इसी प्रकार पञ्चेन्द्रियतिर्यश्चत्रिकमें जानना चाहिए। ३७२. पश्चेन्द्रिय तिर्यश्च अपर्याप्तकोंमें आमिनियोधिक ज्ञानावरणका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाला जीव चार ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा और पाँच अन्तरायका नियमसे बन्ध करता है जो इनका नियमसे उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। दो वेदनीय, सात नोकषाय, आतप और दो गोत्रका कदाचित् बन्ध करता है। यदि बन्ध करता है तो इनका नियमसे उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। दो गति, पाँच जाति, छह संस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, छह संहनन, दो आनुपूर्वी, परघात, उच्छ्वास, उद्योत, दो विहायोगति और सादि दस युगलका कदाचित् बन्ध करता है और कदाचित् बन्ध नहीं करता। यदि बन्ध करता है तो उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी करता है और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी करता है। यदि अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है तो इनका नियमसे संख्यातभागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। औदारिकशरीर, तेजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात और निर्माणका नियमसे बन्ध करता है। किन्तु वह इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी करता है और अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी करता है। यदि अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है तो इनका नियमसे संख्यातभागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। इसी प्रकार चार ज्ञानावरण, नौदर्शनावरण दो वेदनीय, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, सात नोकषाय, नीचगोत्र और पाँच अन्तरायकी मुख्यतासे सन्निकर्ष जानना चाहिए। ३७३. स्त्रीवेदका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाला जीच पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा और पाँच अन्तरायका नियमसे बन्ध करता है जो इनका नियमसे उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। दो वेदनीय, चार नोकषाय और दो गोत्रका कदाचित् बन्ध करता है। यदि बन्ध करता है तो इनका नियमसे उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। दो गति, हुण्डसंस्थान, असम्प्राप्तामृपाटिकासंहनन, दो आनुपूर्वी, उद्योत, स्थिर आदि तीन युगल, दुभंग और अनादेयका कदाचित् बन्ध करता है। यदि बन्ध करता है तो इनका नियमसे Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001393
Book TitleMahabandho Part 6
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages394
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size10 MB
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