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________________ २३७ उत्तरपगदिपदेसर्वधे सण्णियासं ३७०. णग्गोध० उक० पदे०ब पंचणा०-थीणगिद्धि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४पंचंत० णिणि . उक० । छदंस०-बारसक०-भय-दु० णि बणि० अणंतभागणं ब। दोवेदणी०-इत्थि०-णवूस०-दोगोद० सिया० उक्क० । पंचणोक० सिया० अणंतभागणं च । णामाणं सत्थाणभंगो । एवं तिण्णिसंठा० १-पंचसंघ० । ३७१. उच्चा० उक्क० पदे०ब पंचणा०-पंचंत० णि० ब० उक्क० । थीणगिद्धि०३. दोवेदणी०-मिच्छ०-अणंताणु०४-इत्थि०-णqस०-देवगदि०४-चदुसंठा०-पंचसंघ० सिया० उक्क० । छदंस०-अट्ठक०-भय-दु० णि० बं० णि० तं० तु. अणंतभागणं बं० । अपचक्खाण०४-पंचणोकसायं सिया० अर्णतभागूणं । मणुस-[ ओरालि०-] हुंड०-ओरालि०अंगो०-असंप०-मणुसाण-अप्पसत्थ० -थिरादितिण्णियुग०-दूभग-दुस्सरअणार्दै सिया० संखेंजदिभागूणंब । पंचिंदि०-तेजा०-क०-वण्ण०४-अगु०४-तस०४वैक्रियिकशरीर, समचतुरस्त्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, देवगत्यानुपूर्वी, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर और आदेयकी मुख्यतासे सन्निकर्ष जानना चाहिए । ३७०. न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थानका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाला जीव पाँच ज्ञानावरण, स्त्यानगृद्धित्रिक, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क और पाँच अन्तरायका नियमसे बन्ध करता है जो इनका नियमसे उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। छह दर्शनावरण, बारह कषाय, भय और जुगुप्साका नियमसे बन्ध करता है जो इनका नियमसे अतन्तभागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। दो वेदनीय, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद और दो गोत्रका कदाचित् बन्ध करता है। यदि बन्ध करता है तो इनका नियमसे उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। पाँच नोकषायोंका कदाचित् बन्ध करता है। यदि बन्ध करता है तो इनका नियमसे अनन्तभागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। नामकर्मकी प्रकृतियोंका भङ्ग स्वस्थान सन्निकर्षके समान है। इसी प्रकार तीन संस्थान और पाँच संहननकी मुख्यतासे सन्निकर्ष जानना चाहिये। ३७१. उच्चगोत्रका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवाला जीव पाँच ज्ञानावरण और पाँच अन्तरायका नियमसे बन्ध करता है जो इनका नियमसे उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। स्त्यानगृद्धि त्रिक, दो वेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, देवगतिचतुष्क, चार संस्थान और पाँच संहननका कदाचित् बन्ध करता है। यदि बन्ध करता है तो इनका नियमसे उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है । छह दर्शनावरण, आठ कषाय, भय और जुगुप्साका नियमसे बन्ध करता है। किन्तु वह इनका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध भी करता है और अनुत्कृष्ट प्रदेशवन्ध भी करता है । यदि अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है तो इनका नियमसे अनन्तभागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। अप्रत्याख्यानावरण चतुष्क और पाँच नोकषायका कदाचित् बन्ध करता है। यदि वन्ध करता है तो इनका निययसे अनन्तभागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। मनुष्यगति, औदारिकशरीर, हुण्डसंस्थान, औदारिकशरीर आङ्गोपाङ्ग, असम्प्राप्तामृपाटिकासंहनन, मनुष्यगत्यानुपी, अप्रशस्त विहायोगति, स्थिर आदि तीन युगल, दुर्भग, दुःस्वर और अनादेयका कदाचित् बन्ध करता है। यदि बन्ध करता है तो इनका नियमसे संख्यातभागहीन अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। पञ्चेन्द्रियजाति, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वणेचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, त्रसचतुष्क और निर्माणका नियमसे बन्ध करता है जो इनका 1. ता०मा०प्रत्योः एवं चदुसंठा०' इति पाठः । २ ता.पा प्रत्योः 'अपचक्खाण ४ चदुणोकसायं इति पाठ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001393
Book TitleMahabandho Part 6
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages394
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size10 MB
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