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________________ ६४ महाबंधे अणुभागबंधाहियारे णामा० ज० जह० उक्क० अंतो० । अज० जह० जह० एग०, उक्त० चत्तारि सम । गोद० जह० णत्थि अंतरं । अज० [ जहण्णु० ] एग० । १५३. कायजोगि० धादि०४ जह० अज० ओघं० । वेद०-णामा० ओघं० । आउ० एइंदियभंगो । गोद० जह० णत्थि अंतरं । अज० ओघं । १५४. ओरालि. धादि०४ जह० [अज०] णत्थि अंतरं। वेद०-णामा० जह० जह. एग०, उक० बावीसं वाससहस्साणि देसू० । अज० जह० एग०, उक्क० चत्वारि सम । आउ० जह० अज० जह० एग०, उक० सत्तवाससह० सादि०। गोद. जह० जह० एग०, उक्क० तिण्णिवाससह० देसू० । अज० जह० एग०, उक्क० बेसम० । ओरालिय जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। अजघन्य अनुभाग बन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर चार समय है। गोत्रकर्मके जघन्य अनुभागबन्धका अन्तरकाल नहीं है। अजघन्य अनुभागबन्धका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर एक समय है । विशेषार्थ-पाँच मनोयोगी और पाँच वचनयोगी जीवोंमें चार घातिकोका जघन्य अनुभागबन्ध क्षपकणिमें होता है : तथा उपशमश्रेणिमें योगपरिवर्तन हो जाता है, इसलिए यहाँ इनके जघन्य और अजघन्य अनुभागबन्धके अन्तरकालका निषेध किया है। वेदनीय और नामकर्मका जघन्य अनुभागबन्ध सम्यग्दृष्टि या मिथ्यादृष्टि परिवर्तमान मध्यम परिणामवाले जीवके होता है। तथा आयुकर्मका जघन्य अनुभागबन्ध अन्यतर अपर्याप्त निवृत्तिसे निवृत्तमान मध्यम परिणामवाले नीवके होता है। उक्त योगोंमें यह अवस्था अन्तर्मुहूर्तके बाद हो सकती है, इसलिए इनमें इन कर्मोके जघन्य अनुभागबन्धका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है। गोत्रकर्मका जघन्य अनुभागबन्ध सातवीं पृथिवीमें सम्यक्त्वके अभिमुख हुए जीवके होता है, पर इन योगोंमें एक बार गोत्रकर्मका जघन्य अनुभागबन्ध होने पर उसी योगके रहते हुए दूसरी बार वह अवस्था प्राप्त नहीं होती, इसलिए इन योगोंमें गोत्रकर्मके जघन्य अनुभागबन्धका निषेध किया है । शेष कथन सुगम है। १५३. काययोगी जीवोंमें चार घाति कर्मों के जघन्य और अजघन्य अनुभागबन्धका अन्तर काल ओघके समान है। वेदनीय और नाम कर्मका भंग ओघके समान है। प्रायकर्मका भंग एकेन्द्रियोंके समान है। गोत्रकर्मके जघन्य अनुभागबन्धका अन्तरकाल नहीं है। अजघन्य अनु. भागबन्धका अन्तरकाल ओघ के समान है। विशेषार्थ-काययोगके रहते हुए गोत्रकर्मका जघन्य अनुभागयन्ध दो बार सम्भव नहीं है, इसलिए यहाँ गोत्रकर्मके जघन्य अनुभागबन्धका निषेध किया है। शेष कथन सुगम है, क्योंकि पहले उसका विचार कर आये हैं। १५४. औदारिक काययोगी जीवोंमें चार घाति कर्मोके जघन्य और अजघन्य अनुभागयन्धका अन्तरकाल नहीं है । वेदनीय और नामकर्मके जघन्य अनुभाग बन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम बाईस हजार वर्ष है। अजघन्य अनुभागबन्धका जघन्य अन्वर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर चार समय है । आयुकर्म के जघन्य और अजघन्य अनुभाग बन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक सात हजार वर्ष है। गोत्रकर्मके जघन्य अनुभाग बन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन हजार वर्ष है। अजघन्य अनुभाग बन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर दो समय है। औदारिक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001391
Book TitleMahabandho Part 4
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages454
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size11 MB
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