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________________ अंतरपरूवरणा ४०६ ६२५. असंजदे पंचणा०-छदसणा०-बारसक०--भय--दु०-अप्पसत्थ०४-उप०पंचंत० ज० अज० णत्थि अंतरं । थीणगिद्धि०३-मिच्छ०-अणंताणु०४ ज० पत्थि० अंतरं । अज० णिरयभंगो । सादादिदंडओ चदुआउ०-वेउब्बियछ०-मणुस०३ ज. अज० ओघं। तिरिक्व०-तिरिक्वाणु०-णीचा० ज० ओघं । अज० [ज.] एग०, उ० तेत्तीसं० दे० । इत्थि०-णqस०-उज्जो० ज० ज० ए०, उ० अणंतका० । अज० ज० एग०, उ० तेत्तीसं० देसू० । पुरिस०-हस्स-रदि-अरदि-सोग० ज० अज० ओघं । चदुजादि-आदाव-थावरादि०४ ज० अोघं । अज० ज० ए०, उ० तेत्तीसं० सादि० । ओरालि०-ओरालि०अंगो०-वज्जरि० ज० अज० ओघं । तित्थ० ज• पत्थि अंतरं । ज्ञानावरणादिका जघन्य अनुभागबन्ध सर्वविशुद्ध परिणामोंसे होता है। यह तो स्पष्ट है पर वे सर्वविशुद्ध परिणाम कब होते हैं, इस विषयमें विकल्प है। यदि जो अन्तर्मुहूर्तमें क्षपकश्रोणि पर आरोहण करनेवाला है उसके होते हैं, इस विकल्पको प्रधानता दी जाती है तो इस संयममें पाँच ज्ञानावरणादिके जघन्य अनुभागबन्धका अन्तर नहीं प्राप्त होता और इन प्रकृतियोंके अजघन्य अनुभागबन्धका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर एक समय बनता है। और यदि ये सर्वविशुद्ध परिणाम क्षपकोणिपर श्रारोहण न करनेवालेके भी होते हैं, इस विकल्पको प्रधानता दी जाती है तो इसके अनुसार इन प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागबन्धका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक पूर्वकोटि तथा अजघन्य अनुभागवन्धका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर दो समय प्राप्त होता है । यही कारण है कि यहाँ दो प्रकारसे अन्तर प्ररूपणा की है । तथा इस संयममें देवगति आदि प्रशस्त प्रकृतियोंका जघन्य अनुभागबन्ध असंयमके अभिमुख हुए जीवके होता है, इसलिए इनके जघन्य और अजघन्य अनुभागबन्धके अन्तरकालका निषेध किया है। देशसंयतके प्रशस्त ध्रुववन्धवाली प्रकृतियांका जघन्य अनुभागबन्ध संयमके अभिमुख होनेपर तथा तीर्थकरके सिवा शेष प्रशस्त प्रकृतियोंका जघन्य अनुभागबन्ध मिथ्यात्वके अभिमुख होनेपर और तीर्थङ्कर प्रकृतिका जघन्य अनुभागबन्ध असंयमके अभिमुख होने पर होता है, इसलिए इनके जघन्य और अजघन्य अनुभागबन्धके अन्तरकालका निषेध किया है । शेष कथन स्पष्ट ही है। ६२५. असंयत जीवोंमें पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, बारह कपाय, भय, जुगुप्सा, अप्रशस्त वर्णचतुष्क, उपघात और पाँच अन्तरायके जघन्य और अजघन्य अनुभागबन्धका अन्तरकाल नहीं है। स्त्यानगृद्धि तीन, मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी चारके जघन्य अनुभागवन्धका अन्तरकाल नहीं है। अजघन्य अनुभागवन्धका भङ्ग नारकियोंके समान है। सातावेदनीय आदि दण्डक, चार आयु, वैक्रियिक छह और मनुष्यगतित्रिकके जघन्य और अजघन्य अनुभागवन्धका अन्तर ओधके समान है। तिर्यञ्चगति, तिर्यञ्चगत्यानपूर्वी और नीचगोत्रके जघन्य अनुभागबन्ध का अन्तर अोधके समान है । अजघन्य अनुभागबन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है। स्त्रीवेद, नपुंसकवेद और उद्योतके जघन्य अनुभागवन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अनन्तकाल है। अजघन्य अनुभागबन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है। पुरुषवेद, हास्य, रति, अरति और शोकके जघन्य और लाजघन्य अनुभागबन्धका अन्तर अोधके समान है। चार जाति, आतप और स्थावर आदि चारके जघन्य अनुभागबन्धका अन्तर ओघके समान है। अजघन्य अनुभागबन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर साधिक वेतीस सागर है । औदारिकशरीर, १. प्रा. प्रतौ ज. ज. णस्थि इति पाठः। ५२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001391
Book TitleMahabandho Part 4
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages454
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size11 MB
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