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________________ अन्तरपरूवणा ३४६ ५७७, विभंगे पंचणा०--णवदंसणा०-मिच्छ०- सोलसक० --भय-- दु० -- अप्पसत्थ०४–उप०-पंचंत०- उ० ज० एग०, उ० तँत्तीसं० देसू० । अणु० ज० एग०, उ० बेस० । सादा०-- दुर्गादि - पंचिंदि० - दोसरीर० समचदु० - दो अंगो० - वज्जरि० - दोआणु०पर० - उस्सा ० - उज्जो ० -- अप्पसत्थ० --तस०४ - थिरादिछ००-- उच्चा० उ० णत्थि अंतरं । अणु० ज० एग०, उ० अंतो० । असादा० - सत्तणोक० अथिरादि ० ३ ॐ० ज० एग०, उ० तैंतीसं० दे० । अणु० ज० एग०, उ० अंतो० । णिरय देवायु० मणजोगिभंगो । तिरिक्ख- मणुसायु० ज० एग०, उ० अंतो० । अणु० ज० ए०, उ० छम्मासं दे० । णिरयगदि - - तिष्णिजादि - णिरयाणु०हुम-अपज्जत्त-साधा० उ० अणु० ज० भागबन्ध होता है, अतः इसके अन्तरकालका निषेध किया है। तथा ओघसे इनके अनुत्कृष्ट अनु. भागबन्धका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अनन्त काल कहा है। वह यहाँ बन जानेसे ओघ के समान कहा है । श्रघसे चार जाति आदिके उत्कृष्ट अनुभागबन्धका जो अन्तर कहा है, वह यहाँ भी बन जाता है, अतः यह भी ओघ के समान कहा है। तथा नरकमें और नरकमें जानेके पूर्व और निकलनेके बाद अन्तर्मुहूर्त काल तक इनका बन्ध नहीं होता, अतः इनके अनुत्कृष्ट अनुभागबन्धका उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस सागर कहा है । औदारिकशरीर आदिका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध सम्यक्त्व के अभिमुख हुए देव नारकीके होता है, अतः इनके उत्कृष्ट अनुभागबन्ध अन्तरका निषेध किया है। तथा पर्याप्त अवस्था में भोगभूमिमें इनका बन्ध नहीं होता, अतः इनके अनुत्कृष्ट अनुभागबन्धका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन पल्य कहा है । संयमके अभिमुख हुए जीवके तैजसशरीर आदिका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध होता है तथा ये ध्रुवबन्धिनी प्रकृतियाँ हैं, अतः इनके उत्कृष्ट और उत्कृष्ट अनुभागबन्धके अन्तरकालका निषेध किया है । उद्योतका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध सातवें नरक में सम्यक्त्व के अभिमुख हुए नारकीके होता है, अतः इसके अन्तरका निषेध किया है। तथा इसका नौवें ग्रैवेयक में और वहाँ जानेसे पूर्व और बाद में अन्तर्मुहूर्त काल तक बन्ध नहीं होता, अतः इसके अनुत्कृष्ट अनुभागबन्धका उत्कृष्ट अन्तर साधिक इकतीस सागर कहा है । ५७७. विभङ्गज्ञानमें पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिध्यात्व, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा, प्रशस्त वर्णचतुष्क, उपघात और पाँच अन्तरायके उत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है । अनुत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्य अन्तर एक समय हैं और उत्कृष्ट अन्तर दो समय है । सातावेदनीय, दो गति, पञ्चेन्द्रिय जाति, दो शरीर, समचतुरस्त्र संस्थान, दो आङ्गोपाङ्ग, वज्रर्षभनाराच संहनन, दो आनुपूर्वी, परघात, उच्छ्वास, उद्योत, अप्रशस्त विहायोगति, त्रसचतुष्क, स्थिर आदि छह और उच्चगोत्र के उत्कृष्ट अनुभागबन्धका अन्तरकाल नहीं है । अनुत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । असातावेदनीय, सात नोकपाय और अस्थिर आदि तीन के उत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है । अष्ट अनुभागबन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है। और वायु भङ्ग मनोयोगी जीवों के समान है । तिर्यञ्चायु और मनुष्यायुके उत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तमुहूर्त है । अनुत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम छह महीना है । नरकगति, उ० १. ता० प्रतौ पंचंत० उ० तेत्तीस इति पाठः । २ ता० प्रतौ उ० बेस० सादि० | दुर्गादि इति पाठ: । ३. श्रा प्रतौ अथिरादिछ० उ० इति पाठः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001391
Book TitleMahabandho Part 4
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages454
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size11 MB
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