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________________ ૫૦ महाधे अणुभागबंधाहियारे वेस० । अणु० ज० ए०, उ० असंखेज्जा लोगा । बादरे कम्पद्विदी । पज्जते संखेज्जाणिवाससहस्साणि । सुहुमे असंखेंज्जा लोगा । सेसाणं अपज्जत्तभंगो । ४८७. वणफदि० एइंदियभंगो । तिरिक्खगदितिग० परिय० भाणिदव्वं । बादर०पत्ते ० बादरपुढविभंगो । णियोद० पुढविभंगो । ४८८. पंचमण० - पंचवचि० साद० - देवर्गादि ० - पंचिंदि ० चदुसरीर - समचदु०दोगो० - पत्थ०४ - देवाणु ० - अगु० ३ – उज्जो ० - पसत्थवि०-तस०४-थिरादिछ० - णिमि०तित्थ०-उच्चा० उ० ए० । अणु० ज० ए०, उक्क० अंतो० । सेसाणं उ० ज० ए०, उ० बेसम० । अणु० ज० ए०, उ० अंतो० । अनुभागबन्धका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल दो समय है । अनुत्कृष्ट अनुभागबन्ध का जघन्यकाल एक समय है और उत्कृष्ट काल असंख्यात लोक प्रमाण है । बादरोंमें कर्मस्थितिप्रमाण है । पर्याप्तकों में संख्यात हजार वर्ष है और सूक्ष्मों में असंख्यात लोकप्रमाण है । शेष प्रकृतियों का भङ्ग अपर्याप्त जीवोंके समान है । विशेषार्थ - अमिकायिक और वायुकायिक जीवोंमें तिर्यगति, तिर्यगत्यानुपूर्वी और गोत्रका ही बन्ध होता है । इनकी प्रतिपक्ष प्रकृतियोंका बन्ध नहीं होता, अतः यहाँ ये ध्रुवबन्धनी ही हैं। शेष कथन सुगम है । ४८७. वनस्पतिकायिक जीवोंमें एकेन्द्रियोंके समान भङ्ग है । मात्र यहाँ तिर्यञ्चगतित्रिकको परिवर्तमान प्रकृतियों के साथ कहना चाहिए। बादर प्रत्येक वनस्पतिकायिक जीवों में बादर पृथिवीकायिक जीवोंके समान भङ्ग है । तथा निगोद जीवोंमें पृथिवीकायिक जीवोंके समान भङ्ग है । विशेषार्थ — एकेन्द्रियों में अमिकायिक और वायुकायिक जीव भी सम्मिलित हैं, इसलिए उनमें इनकी अपेक्षा तिर्यञ्चगतित्रिकको ध्रुवबन्धिनी मान कर काल कहा है; पर वनस्पतिकायिक जीवों में यह बात नहीं है, इसलिए इनमें तिर्यगतित्रिककी परिवर्तमान प्रकृतियोंके साथ परिगणना करनेकी सूचना की है। बादर प्रत्येक वनस्पतिकायिक जीवोंकी कार्यस्थिति वादर पृथिवीकायिक जीवों के समान होने से इनमें कालकी प्ररूपणा बादर पृथिवीकायिक जीवोंके समान कही | निगोद hari का स्थिति यद्यपि ढाई पुद्गल परिवर्तन प्रमाण है, पर इनके बादर जीवोंकी काय स्थिति बादर पृथिवीकायिक जीवोंके ही समान है। यह देखकर यहाँ सामान्यसे निगोद जीवों की प्ररूपणा पृथिवीकायिक जीवोंके समान जाननेका निर्देश किया है। ४८८. पाँच मनोयोगी और पाँच वचनयोगी जीवोंमें सातावेदनीय, देवगति, पञ्च ेन्द्रियजाति, चार शरीर, समचतुरस्र संस्थान, दो आङ्गोपाङ्ग, प्रशस्त वर्णचतुष्क, देवगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघुत्रिक, उद्योत, प्रशस्त विहायोगति, त्रसचतुष्क, स्थिरादि छह, निर्माण, तीर्थङ्कर और उच्चगोत्रके उत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। अनुत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त हैं। शेष प्रकृतियोंके उत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल दो समय है । अनुत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । विशेपार्थ - इन पूर्वोक्त योगोंका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त होनेसे यहाँ सब प्रकृतियों के अनु त्कृष्ट अनुभागबन्धका उत्कृष्ट काल अन्तमुहूर्त कहा है । तथा प्रथम दण्डकमें जो सातावेदनीय आदि प्रकृतियाँ कही गई हैं, सब क्षपक प्रकृतियाँ हैं और क्षपक प्रकृतियों के उत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है, यह ओघमें बतला ही आये हैं। अतः वह श्रोघप्ररूपणा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001391
Book TitleMahabandho Part 4
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages454
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size11 MB
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