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________________ २२२ महाबंधे अणुभागबंधाहियारे आयु० ओघं । तिरिक्खग०-तिरिक्खाणु०-णीचा० ज० कस्स० १ अण्ण० बादरतेउ०वाउ० से काले सरीरपज्जत्ती जाहिदि त्ति जह० वट्ट० । मणुसग०-पंचजादि-छस्संठा'०छस्संघ०-मणुसाणु०-दोविहा०-तसादिचदुयुग०-सुभगादितिण्णियुग-उच्चा० जह० कस्स०? अण्ण० मिच्छा० परिय०मज्झिम० । देवगदिपंच० जह• कस्स० ? अण्ण तिरिक्व० मणुस० सम्मा० सागा० सव्वसंकि० से काले सरीरपज्जती जाहिदि ति । णवरि तित्थय० मणुसग०। ओरालि०-तेजा-क०-पसत्थवण्ण०४-अगु०-णिमि० जह० कस्स० ? अण्ण० पंचिंदि० सण्णि० मिच्छा० सव्वसंकि० । ओरालि०अंगो०-पर०उस्सा०-आदाउज्जो० जह० कस्स० ? अण्ण० पंचि० सण्णि० तप्पा०संकि० । ४५५. वेउव्वियका० पंचणा०-छदंसणा०-बारक०-पंचणोक०-अप्पसत्थवण्ण०४उप-पंचंत० जह० कस्स. ? अण्ण० देवस्स रइ० सम्मादि० सागा० सव्वविसु० । थीणगिद्धि०३-मिच्छ०-अणंताणुबं०४ ज० कस्स० ? अण्ण० देव० रइ० मिच्छा. सागा० सव्ववि० सम्मत्ताभिमुह० । सादादिचदुयुग० जह० कस्स० ? अण्ण० देव० wwwwwwwwwwwwmmmm जीव उक्त प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी है। अरति और शोकके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी कौन है? तप्रायोग्य विशुद्ध अन्यतर सम्यग्दृष्टि जीव उक्त प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी है। दो आयुओंका भङ्ग ओघके समान है। तिर्यश्चगति, तिर्यश्चगत्यानुपूर्वी और नीचगोत्रके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी कौन है ? जघन्य अनुभागबन्ध करनेवाला जो अन्यतर बादर अग्निकायिक और बादर वायुकायिक जीव अनन्तर समयमें शरीर पर्याप्ति ग्रहण करेगा,वह उक्त प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी है। मनुष्यगति, पाँच जाति, छह संस्थान, छह संहनन, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, दो विहायोगति, सादि चार युगल, सुभगादि तीन युगल और उच्चगोत्रके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी कौन है ? परिवर्तमान मध्यम परिणामवाला अन्यतर मिथ्यादृष्टि जीव उक्त प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी है। देवगतिपञ्चकके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी कौन है ? साकार-जागृत और सर्व संक्लेशयुक्त जो अन्यतर सम्यग्दृष्टि तिर्यञ्च और मनुष्य अनन्तर समयमें शरीर पर्याप्ति ग्रहण करेगा, वह उक्त प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी है। इतनी विशेषता है कि तीर्थङ्कर प्रकृतिके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी मनुष्यको कहना चाहिए। औदारिकशरीर, तेजसशरीर, कामणशरीर, प्रशस्त वर्णचतुष्क, अगुरुलघु और निर्माणके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी कौन है ? सर्व संक्लेशयुक्त अन्यतर पञ्चन्द्रिय संज्ञी मिथ्यादृष्टि जीव उक्त प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी है। औदारिक आङ्गोपाङ्ग, परघात, उच्छवास, आतप और उद्योतके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी कौन है ? तत्यायोग्य संक्लेशयुक्त अन्यतर पञ्चन्द्रिय संज्ञी जीव उक्त प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी है। ४५५. वैक्रियिककाययोगी जीवोंमें पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, बारह कषाय, पाँच नोकषाय, अप्रशस्त वर्णचतुष्क, उपघात और पाँच अन्तरायके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी कौन है ? साकार-जागृत और सर्वविशुद्ध अन्यतर सम्यग्दृष्टि देव और नारकी उक्त प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी है। स्त्यानगृद्धि तीन, मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी चारके जघन्य अनुभागबन्धका स्वामी कौन है? साकार-जागृत सर्वविशुद्ध और सम्यक्त्वके अभिमुख १. ता. पा. प्रत्योः मणुसग पंचिदि० छस्संठा० इति पाठः । २. ता. प्रतौ पंचणा० इति पाठः। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001391
Book TitleMahabandho Part 4
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages454
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size11 MB
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