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________________ जीवसमुदाहारे णाणाजीवकालाणुगमो १७ जीवसमुदाहारो ३८७. जीवसमुदाहारै ति तत्थ इमाणि अट्ठ अणिओगद्दाराणि-एयट्ठाणजीवपमाणाणुगमो णिरंतरट्ठाणजीवपमाणाणुगमो सांतरट्ठाणजीवपमाणाणुगमो णाणाजीव. कालपमाणाणुगमो वडिपरूवणा जवमझपरूवणा फोसणपरूवणा अप्पाबहुए] ति । ३८८. एयट्ठाणजीवपमाणाणुगमेण ऍक्ककम्मि हाणे जीवा अणंता । ३८६. णिरंतरहाणजीवाणुगमेण जीवेहि अविरहिदाणि हाणाणि । ३६०. सांतर० जीवेहि अविरहिदाणि हाणाणि । ३९१. णाणाजीवकालाणुगमेण एक्ककम्हि द्वाणम्हि णाणाजीवो केवचिरं कालादो होदि ? सव्वद्धा । भागवृद्धिस्थानोंसे संख्यातगुणवद्धिस्थान संख्यातगुणे कहे हैं। इसके आगे जो प्रथम असंख्यात. गुणवृद्धिस्थान उत्पन्न हुआ है, उससे लेकर अंगुलके असंख्यातवेंभागगुणे स्थान जाने तक बीच में जितने भी अनन्तरोपनिधाकी अपेक्षा अनन्तभागवृद्धि, असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागवद्धि और संख्यातगुणवृद्धिरूप स्थान उपलब्ध होते हैं, वे सब परम्परोपनिधासे असंख्यातगुणवृद्धिको लिए हुए ही हैं। यतः ये स्थान संख्यातगुणवृद्धिस्थानोसे असंख्यातगुणे कहे हैं। इसके आगे सब असं. ख्यातलोकप्रमाण अनुभागस्थानों में जो अनन्तरोपनिधाकी अपेक्षा अनन्तभागवृद्धि आदि स्थान है,वे सब परम्परोपनिधाकी अपेक्षा अनन्तगुणवृद्धिको लिए हुए ही हैं। यतः ये असंख्यातगुणे हैं, अतः यहाँ असंख्यातगुणवृद्धिस्थानोंसे अनन्तगुणवृद्धिस्थान असंख्यातगुणे कहे हैं। जीवसमुदाहार ३८७. अब जीवसमुदाहारका प्रकरण है। उसमें ये आठ अनुयोगद्वार होते हैं-एकस्थानजीवप्रमाणानुगम, निरन्तरस्थानजीवप्रमाणानुगम, सान्तरस्थानजीवप्रमाणानुगम, नानाजीवकालप्रमाणानुगम, वृद्धिप्ररूपणा, यवमध्यप्ररूपणा, स्पर्शनप्ररूपणा और अल्पबहुत्व। . ३८८. एकस्थानजीवप्रमाणानुगमकी अपेक्षा एक-एक स्थानमें जीव अनन्त हैं। विशेषार्थ-सव अनुभागबन्धस्थान असंख्यात लोकप्रमाण हैं। उनमेंसे प्रत्येक स्थानमें कितने जीव होते हैं.यह इस अनुयोगद्वारमें बतलाया गया है। इसमें प्रत्येक स्थानमें अनन्त जीव होते हैं,ऐसा निर्देश किया है सो यह प्ररूपणा स्थावर जीवोंकी मुख्यतासे जाननी चाहिए । बस जीवोंकी अपेक्षा विचार करनेपर प्रत्येक स्थानमें त्रस जीव कमसे कम एक, दो या तीन और अधिकसे अधिक आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण होते हैं। ३८६. निरन्तरस्थानजीवप्रमाणानुगमकी अपेक्षा जीवोंसे युक्त सब स्थान हैं। विशेषार्थ-ये जो असंख्यातलोकप्रमाण अनुभागबन्धस्थान बतलाये हैं, उनमेंसे प्रत्येकमें स्थावर जीव पाये जाते हैं, इसलिए इस अपेक्षासे कोई भी स्थान जीवोंसे रहित नहीं होता। किन्तु त्रस जीवोंकी अपेक्षा इन स्थानों में से कमसे कम एक. दो या तीन स्थान जीवोंसे युक्त होते हैं और अधिकसे अधिक आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण स्थान जीवोंसे युक्त ३६० सान्तरस्थानजीवप्रमाणानुगमकी अपेक्षा जीवोंसे युक्त सब स्थान हैं। विशेषार्थ-यह पहले ही बतला आये हैं कि जितने अनुभागबन्धस्थान होते हैं,उन सबमें स्थावर जीव उपलब्ध होते हैं. अतः स्थावर जीवोंकी अपेक्षा एक भी सान्तरस्थान उपलब्ध नहीं होता। किन्तु त्रसजीवोंकी अपेक्षा विचार करनेपर जीवोंसे रहित कमसे कम एक, दो या तीन स्थान सान्तर होते हैं और अधिकसे अधिक असंख्यात लोकप्रमाण स्थान सान्तर होते हैं। ३६१. नानाजीवकालप्रमाणानुगमकी अपेक्षा एक-एक स्थानमें नाना जीवोंका कितना काल है ? सब काल है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001391
Book TitleMahabandho Part 4
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages454
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size11 MB
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