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________________ ११० महाबंधे अणुभागबंधाहियार घादे०४ उक्क० जह० एग०, उक्क० आवलिया, असंखें । अणुक्क० सम्बद्धा । वेद.आउ०णामा०.गोद० उक्क० जह० एग०, उक्क० संखेलसम० । अणु० सम्बद्धा। एवं कायजोगि-ओरालि०-ओरालियमि०-णqस० कोधादि ४-अचक्खु०-भवसि-आहारग ति । २४१. णिरएसु सत्तण्णं क. उक्क. जह० एग०, उक्क० आवलि. असंखें । अणुक० सव्वद्धा । आउ० उक्क० जह० एग०, उक्क० संखेजसम० । अणु० जह० एग०, उक० पलिदो० असं०। एवं छसु पुढवीसु पंचिंदि तिरि०-मणुस-पंचिंदि०-तस० अपज०-सबविगलिंदि०-चादरपुढवि०-आउ०पज०-बादरवण पत्ते०पज०-वेउन्वि०वेउव्वियमि० । णवरि मणुसअप०-वेवियमि० सत्तणं क० [अणुक०] जह० एग०, निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश। ओघसे चार घातिकर्मों के उत्कृष्ट अनुभागके बन्धक जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उस्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भाग प्रमाण है। अनुस्कृष्ट अनुभागके बन्धक जीवोंका काल सर्वदा है। वेदनीय, आयु, नाम और गोत्रकर्मके उत्कृष्ट अनुभागके बन्धक जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है । अनुत्कृष्ट अनुभागके बन्धक जीवों का काल सर्वदा है । इसी प्रकार काययोगी, औदारिककाययोगी, औदारिक मिश्रकाययोगी, नपुंसकवेदी, क्रोधादि चार कषायवाले, अचक्षुदर्शनी, भव्य और आहारक जीवो के जानना चाहिये। विशेषार्थ-चार यातिकर्मोंका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध संज्ञी पंचेन्द्रियपर्याप्त मिथ्यादृष्टि जीवोंके उत्कृष्ट संक्लेश परिणामोंसे होता है। ऐसे संक्लेश परिणाम एक समय होकर दुसरे समय नहीं भी होते. और होते रहते हैं तो आवलिके असंख्यातवें भाग काल तक निरन्तर होते रहते हैं। यही कारण है कि चार घातिकर्मों के उत्कृष्ट अनुभागके बन्धक जीवोंका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यात भाग प्रमाण कहा है। अनुत्कृष्ट अनुभागबन्धका काल सर्वदा है,यह स्पष्ट ही है। वेदनीय, नाम और गोत्रकर्मका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध क्षपकश्रेणीमें होता है। और आयुकर्मका उत्कृष्ट अनुभागवन्ध अप्रमत्तसंयत जीवके होता है। एक तो क्षपकश्रेणीके जीव निरन्तर नहीं होते, दूसरे यदि होते हैं, तो वे कमसे कम एक समय तक क्षपकश्रेणि पर आरोहण करते हैं या संख्यात समय तक निरन्तर आरोहण करते हैं। अप्रमत्तसंयत गुणस्थानमें आयुकर्म के बन्ध योग्यपरिणामोंकी यही विशेषता है। यही कारण है कि ओघसे इन कोके उत्कृष्ट अनुभागबन्धव काल एक समय और उत्कृष्टकाल संख्यात समय कहा है। इन कर्मोका अनुत्कृष्ट अनुभागबन्ध नाना जीवोंके सर्वदा होता रहता है, इसलिए इसका काल सर्वदा कहा है । यहाँ जो अन्य मार्गणाएँ गिनाई हैं उनमें यह ओघ- प्ररूपणा अविकल घटित हो जाती है, इसलिए उनका कथन ओघके समान किया है। २४१. नारकियों में सात कोके उत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यात भागप्रमाण है। अनुत्कृष्ट अनुभागबन्धका काल सर्वदा है। आयुकर्मके उत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है । अनुत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण है। इसी प्रकार छह पृथिवियोंमें तथा पंचेन्द्रिय तिर्यश्च अपर्याप्त, मनुष्य अपर्याप्त, पंचेन्द्रिय अपर्याप्त, वस अपर्याप्त, सब विकलेन्द्रिय, बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त, बादर जलकायिक पर्याप्त, बादर वनस्पति कायिक प्रत्येक शरीर पर्याप्त, वैक्रियिक काययोगी और वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोंके जानना चाहिये। इतनी विशेषता है कि मनुष्य अपर्याप्त और वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोंमें सात कर्मों के अनुत्कृष्ट अनुभागबन्धका जघन्यकाल एक समय है और उस्कृष्टकाल पल्य के असंख्यातवें भाग प्रमाण Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001391
Book TitleMahabandho Part 4
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages454
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size11 MB
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