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________________ पडबंधाहियारो सासणे - पंचणा ०णवदंसण ० ( णा० ) सोलसक० भयदु० तिष्णिगदि० पंचिंदि० चदुसरी ० समचदु ० दो -अंगो० वण्ण०४ तिणि आणुपुव्वि० अगु०४ पसत्थवि० तस०४ सुभगसुस्सर-आदे० णिमिणं णीचुच्चागो० पंचंतरा० जह० एग०, उक्क० छावलियाओ । तिण्णि - आयु० ओघं । सेसाणं जह० एग०, उक्क० अंतो० । सम्मामि० - सादासादा० चदुणोक० थिरादि- तिष्णि युग० जह० एग०, उक्क० अंतो० | सेसाणं जहण्णु० अंतो० । 1 २७. सणि० - धुविगाणं जह० खुद्दाभ०, उक० सागरोपमसदपु० । सेसं पंचिंदिय विशेषार्थ - असंयत सम्यक्त्वी अथवा देशसंयमीकी अपेक्षा उपशमसम्यक्त्वका जघन्य और उत्कृष्ट बन्धकाल अन्तर्मुहूर्त है । प्रमत्तसंयत से लेकर उपशान्तकपाय वीतरागछद्मस्थ पर्यन्त एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है । (ध० टी०, काल० ४८२-४८४ ) सासादन सम्यक्त्व में - ५ ज्ञानावरण, ९ दर्शनावरण, १६ कषाय, भय, जुगुप्सा, गति (नरकगतिरहित ), पंचेन्द्रिय जाति ४ शरीर, समचतुरस्रसंस्थान, दो अंगोपांग, वर्ण ४, तीन आनुपूर्वी, अगुरुलघु ४, प्रशस्त विहायोगति, त्रस ४, सुभग, सुस्वर, आदेय, निर्माण, नीच उच्च-गोत्र तथा ५ अन्तरायोंका 'जघन्य बन्धकाल एक समय और उत्कृष्ट ६ आवली प्रमाण है। ७७ विशेषार्थ- कोई उपशमसम्यक्त्वी उपशमसम्यक्त्वका एक समय शेष रहनेपर सासादन गुणस्थानको प्राप्त हुआ, उसकी अपेक्षा सासादनका जघन्य काल एक समय प्रमाण है । कोई उपशमसम्यक्त्वी उपशमसम्यक्त्वका छह आवली प्रमाणकाल शेष रहनेपर सासादनमें आ गया। वहाँ छह आवली प्रमाण काल व्यतीत कर मिथ्यात्व में पहुँचा । इस प्रकार जघन्य बन्धकाल एक समय और उत्कृष्ट छह आवली कहा है । तीन आयुका ओघ के समान काल है। विशेष यहाँ नरकायुका बन्ध नहीं होता है । - - शेष प्रकृतियोंका जघन्य एक समय, उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त है । सम्यक मिध्यादृष्टिमें - साता, असातावेदनीय, ४ नोकषाय, स्थिरादि तीन युगलका जघन्य एक समय, उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त बन्धक है। शेष प्रकृतियोंका जघन्य तथा उत्कृष्ट बन्धकाल अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है । विशेषार्थ- कोई मिथ्यात्वी विशुद्ध परिणामयुक्त हो मिश्र गुणस्थान में सर्वलघु अन्तर्मुहूर्त रहकर चतुर्थ गुणस्थान में चला गया, अथवा कोई वेदकसम्यक्त्वी संक्लेशवश मिश्र गुणस्थानी हुआ, वहाँ सर्वलघु अन्तर्मुहूर्त काल व्यतीत कर पुनः संक्लेशवश मिध्यात्वी हुआ । इसी प्रकार कोई मिथ्यात्वी विशुद्ध परिणाम-युक्त हो उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त -प्रमाण मिश्र गुणस्थानी रहा, बाद में मिथ्यात्वी हो गया अथवा कोई वेदकसम्यक्त्वी संक्लेशवश मिश्र गुणस्थान में उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त -प्रमाण काल व्यतीत करके पुनः अविरतसम्यक्त्वी हो गया । इनकी अपेक्षा मिश्र गुणस्थानका जघन्य, उत्कृष्ट बन्धकाल अन्तर्मुहूर्त कहा है । संज्ञीमें -२ ध्रुव प्रकृतियोंका जघन्य बन्धकाल क्षुद्रभवग्रहण- प्रमाण है, उत्कृष्ट शत Jain Education International १. “एकजीमं पडुच्च जहण्णंण एगसमओ उक्कस्सेण छआवलियाओ ।" - षट् खं०, काल०, ७, ८ । २. "एगजीवं पडुच्च जहणेण अंतोमुहुत्तं उक्कस्सेण सागरोवमसदबुधत्त ।" -षट खं०, काल०, ३३०-३२ । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001388
Book TitleMahabandho Part 1
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorSumeruchand Diwakar Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1998
Total Pages520
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size12 MB
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