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________________ ३८८] . तिलोयपण्णत्ती [४. १८८५ भिंगाररयणदप्पणबुबुंदवरचमरचक्ककयसोई घंटापडायपउरं जिणिदभवणं णिरूवमाणं तं ॥ १८८५ जिणपासादस्स पुरो जेट्टहारस्स दोसु पासेसु । पुह चत्तारिसहस्सा लंबते रयणमालाओ ॥ १८८६ ताणं पि अंतरेसु अकट्टिमाओ फुरंतकिरणादी । बारससहस्ससंखा लंबते कणयमालाओ ॥ १८८७ १२०००। अट्ठसहस्साणिं धूवघडा दारअग्गभूमीसुं । भट्ठसहस्साओ ताण पुरे कणयमालाओ ॥ १८८८ ८०००। पुह खुल्लयदारेसुं ताणद्धं होंति रयणमालाओ। कंचणमालाओ तह धूवघडा कणयमालाओ ॥ १८८९ चउवीससहस्साणि जिणपुरपुट्टीए कणयमालाओ । ताणं च अंतरेसुं अट्ठसहस्साणि रयणमालाओ ॥ १८९० मुहमंडवो हि रम्मो जिणवरभवणस्स अग्गभागम्मि । सोलसकोसुच्छेहो सयं च पण्णासदीहवासाणिं ॥ १८९१ कोसद्धो ओगाढोणाणावररयणणियरणिम्मविदो । धुव्वंतधयवडाओ किं बहुणा सो णिरुवमाणो ॥ १८९२ मुहमंडवस्स पुरदो अवलोयणमंडओ परमरम्मो । अधिया सोलसकोसा उदओ रुंदों सय सयं दीहं॥१८९३ १६ । १००। झारी, रत्नदर्पण, बुद्बुद, उत्तम चमर और चक्रसे शोभायमान तथा प्रचुर घंटा और पताकाओंसे युक्त वह जिनेन्द्रभवन अनुपम है ॥ १८८५॥ जिनप्रासादके सन्मुख ज्येष्ठ द्वारके दोनों पार्श्वभागोंमें पृथक् पृथक् चार हजार रत्नमालायें लटकती हैं ॥ १८८६ ॥ ४००० । इनक भी बीचमें प्रकाशमान किरणादिसे सहित बारह हजार अकृत्रिम सुवर्णमालायें लटकती हैं ॥ १८८७ ॥ १२००० ।। द्वारकी अग्रभूमियोंमें आठ आठ हजार धूपघट और उन धूपघटोंके आगे आठ आठ हजार सुवर्णमालायें हैं ॥ १८८८ ॥ ८००० । क्षुद्रद्वारोंमें पृथक् पृथक् इससे आधी रत्नमालायें, कंचनमालाय, धूपघट तथा सुवर्णमालायें हैं ॥ १८८९ ॥ जिनपुरके पृष्ठ भागमें चौबीस हजार कनकमालायें और इनके बीच में आठ हजार रत्नमालायें हैं ॥ १८९० ॥ जिनेन्द्र भवनके अग्रभागमें सोलह कोस ऊंचा, सौ कोस लंबा और पचास कोसप्रमाण विस्तारसे युक्त रमणीय मुखमण्डप है ॥ १८९१ ॥ वह मुखमण्डप आध कोस अवगाहसे युक्त, नाना प्रकारके उत्तम रत्नसमूहोंसे निर्मित और फहराती हुई ध्वजा-पताकाओंसे सहित है। बहुत वर्णनसे क्या, वह मण्डप निरुपम ह ॥१८९२।। मुखमण्डपके आगे परमरमणीय अवलोकनमंडप है, जो सोलह कोससे अधिक ऊंचा, सौ कोस विस्तृत और सौ कोस लंबा है ।। २८९३ ॥ १६ । १००। १ द ब ववुद. २ द ब कयसोहो. ३ प्रथमा पंक्तिः ब-पुस्तके नास्ति. ४ द ब घंटापिदाय'. ५ द ब निरूवमाणाओ. ६ द ब अभंते. ७ द व अन्भते.. ८ द ब मुहमंडणेहिं. ९ द ब अंगाढो. १० दब रंदा. ११ ब दीहिं. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001274
Book TitleTiloy Pannati Part 1
Original Sutra AuthorVrushabhacharya
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year1956
Total Pages598
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari & Geography
File Size12 MB
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