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________________ शब्दानुक्रमणिका प्रियंवद = मघरभाषी २१।३१ प्रीति (भौ) एक वापिका५७।३६ प्रीतिकर(व्य) एक राजा४५१३ प्रीतिंकर व्य। प्रीतिभद्र राजा___ का पुत्र २७१९७ प्रीतिकर (भो) ऊर्ध्ववेयकका एक इन्द्र के विमान ६१५३ प्रीतिभद्र (व्य) भरतक्षेत्र चित्र कारपुरका राजा २७।९७ प्रीतिमती (व्य) अरिजयपुरके राजा अरिंजय और अजित सेनाकी पुत्री ३४।१८ प्रेक्षागृह = नाट्यशाला ५७।९३ प्रोहिल (व्य) ११ अंग और दश पूर्वके ज्ञाता एक मुनि ११६२ प्रोष्टिल व्य) भगवान् महावीर के पूर्वभवके गुरुका नाम ६०।१६३ बन्धुमती (व्य) बन्धुषेणकी स्त्री ६०१४८ बन्धुमती(व्य) श्रावस्तीके काम देव सेठकी पुत्री २९७ बन्धुयशा (व्य) एक कन्या ६०४९ बन्धुषण (व्य) वसुदेव और बन्धुमतीका पुत्र ४८।६२ बन्धुषेण (व्य) एक राजा ६०१४८ बहिर्द्विष् = बाह्यशत्रु १।२३ बहुकृत्वः = अनेकबार ६०१३ बहुकेतु (भौ) वि. उ. नगरी २२९३ बहुशिलामय (भौ) रत्नप्रभाके खरभागका सोलहवाँ पटल ४१५४ बहुश्रुतभक्ति-भावना ३४।१४१ बह्नि (व्य) लोकान्तिक देवका एक भेद ५५४१०१ बल (व्य) स्मितयशका पुत्र १३१८ बलदेव (व्य) वसुदेव और रोहिणीका पुत्र ४८०६४ बलभद्र (भौ)सानत्कुमार युगल का छठा इन्द्रक ६।४८ बलभद्र (व्य) आगामी नारायण ६०१५६६ बलभद्रकदेव (व्य) नन्दनवनके बलभद्र कूटपर रहनेवाला देव ९।३२८ बलभद्रक कूट (भौ) नन्दनवनके मध्यमें स्थित एक कूट ५।३२८ बलरिपु (व्य) इन्द्र ५५।१३ बलसिंह (भौ) वैजयन्तो नगरी का राजा ३०३३ बलि (व्य)विजयका पुत्र ४८१४८ बाण (व्य) विजयार्धके शोणित पुर नगरका निवासी विद्या धर ५५।१६ बालचन्द्र (व्य) आगामी बल. ६०५६९ बालचन्द्रा (व्य) वि. द. के गगनवल्लभ नगरकी राज कन्या २६५० बालुकाप्रमा (भौ) नरकोंकी तीसरी भूमि ४।४३ बाह्रीक (व्य) वसूदेव और जरा __ का पुत्र ४८।६३ बाहुबली (व्य) भगवान् ऋषभ देवका पुत्र ९।२२ बाहुल्य = मोटाई ४।४९ बाह्यपरिग्रह (पा) धन-धान्यादि १० प्रकारका बाह्य परि ग्रह २।१२१ बुद्धि (व्य) महापुण्डरीक सरोवर में रहनेवाली देवी ५११३० बुद्धिकूट (भौ) रुक्मिकुलाचलका पाँचवाँ कूट ५।१०३ बुद्धिल (व्य) दशपूर्वके ज्ञाता एक आचार्य ११६३ बुद्धिसेना (व्य) एक गणिका २७।१०१ बृहदगृह (भो) वि. द. नगरी २२।९५ बृहद्ध्वज (व्य) राजा वसुका पुत्र १७।५९ बृहद्ध्वज (व्य) एक राजा ५०११३० बृहद्ध्वज (व्य) कुरुवंशका एक राजा ४५।१७ बृहद्ध्वज (व्य) जरासन्धका पुत्र ५३।३१ बृहद्रथ (व्य) कुंजरावर्त नागपुर-(हस्तिनापुरमें) रहनेवाले सुवसुका पुत्र १८१७ [ब] बद्धप्रलाप (पा) सत्यप्रवाद पूर्व की १२ भाषाओंमें एक भाषा १०।९३ बन्ध (पा) आत्माका कर्मोके साथ एक क्षेत्रावगाह ५८/२०२ बन्ध (पा) अहिंसाणुव्रतका अति चार ५८।१६४ बन्धन = विद्यास्त्र २५।४८ बन्धन (पा) आग्रायणी पूर्वके चतुर्थ प्राभृतका योगद्वार १०८२ बन्धुमती (व्य) वसुदेवकी स्त्री १२८५ बन्धुमती व्य)अरिष्टपुर निवासी रेवतीको पुत्री, बलदेवकी स्त्री ४४०४१ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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