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________________ ५२ चतुर्थः सर्गः साधिका तु परे चासाववरा स्थितिरिष्यते । इन्द्र के नार कामिख्ये लक्षास्तु नवतिः परा ॥५०॥ इयमेव जघन्या स्याद रौरवे' समयाधिका । पूर्वकोट्यस्वसंख्येया परमा परिकीर्तिता ॥२५॥ एषा चैवापरा भ्रान्ते स्थितिः स्यात् समयोत्तरा । सागरस्य पशे भागो दशमोऽत्र परा स्थितिः ॥२५२॥ इयमेव जघन्या स्यादुभ्रान्ते परमा पुनः । द्वावेव दशमी भागाविति तत्वविदां मतम् ॥२५३॥ संभ्रान्ते तु जवन्येयं दशभागास्त्रयः परा । अवराऽसावसंभ्रान्ते परा मागचतुष्टया ॥२५॥ अवराऽसौ च विभ्रान्ते परा सैकशवद्धिता । त्रस्ते त्वबरा सा स्यात् षट् पररा तु दशांशका ॥२५५॥ त्रसिते त्वपरा प्रोक्ता परा सत तर्दशका | वक्रान्रो साऽपरा प्रोक्ता परा चाष्टौ दशांशकाः ॥२५॥ एषैवोक्ता विपश्चिद्भिरवशान्तेऽवरा स्थितिः । नचैते दशमा नागास्तत्रैव परमा स्थितिः ॥२५७॥ इयमेव तु विक्रान्ते जघन्या परमा दश । दश भागा स्थितिः सैषा घर्मायां सागरोपमा ॥२५८॥ सातिरेकाऽवरा सैव स्तरके सागरोपमा । सागरैकादशांशी च सागरस्य परा स्थितिः ॥२५९॥ प्रथम सीमन्तक नामक प्रस्तारमें नारकियोंकी जघन्य स्थिति दश हजार वर्षकी और उत्कृष्ट नब्बे हजार वर्षको कही गयी है ॥२४९॥ दूसरे नारक नामक इन्द्रकमें कुछ अधिक नब्बे हजार वर्षकी जघन्य स्थिति और नब्बे लाख वर्षको उत्कृष्ट स्थिति है ॥२५०|| रौरव नामक तीसरे प्रस्तारमें एक समय अधिक नब्बे लाखकी जयन्य स्थिति और असंख्यात करोड़ वर्षको उत्कृष्ट स्थिति है ॥२५१।। भ्रान्त नामक चौथे प्रस्तारमें एक समय अधिक असंख्यात करोड़ वर्षकी जघन्य स्थिति और सागरके दसवें भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है ।।२५२।। उद्भ्रान्त नामक पाँचवें प्रस्तारमें एक समय अधिक सागरका दसवाँ भाग जघन्य स्थिति है और एक सागरके दश भागोंमें दो भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति तत्त्वज्ञ पुरुषोंने मानी है ॥२५३।। सम्भ्रान्त नामक छठे प्रस्तारमें एक सागरके दश भागोंमें दो भाग तथा एक समय जघन्य स्थिति है और उत्कृष्ट स्थिति सागरके दश भागोंमें तीन भाग प्रमाण है। असम्भ्रान्त नामक सातवें प्रस्तारमें जघन्य स्थिति सागरके दश भागोंमें समयाधिक तीन भाग है और उत्कृष्ट स्थिति सागरके दश भागोंमें चार भाग प्रमाण है ॥२५४|| विभ्रान्त नामक आठवें प्रस्तारमें जघन्य स्थिति एक समय अधिक सागरके दश भागोंमें चार भाग प्रमाण है और उत्कृष्ट स्थिति सागरके दश भागों में पांच भाग प्रमाण है । त्रस्त नामक नौवें प्रस्तारमें एक समय अधिक सागरके दश भागोंमें पांच भाग प्रमाण जघन्य स्थिति है और सागरके दश भागोंमें छह भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है ।।२५५।। त्रसित नामक दसवें प्रस्तारमें जघन्य स्थिति एक समय अधिक सागरके दश भागोंमें छह भाग प्रमाण है और उत्कृष्ट स्थिति सागरके दश भागोंमें सात भाग प्रमाण है। वक्रान्त नामक ग्यारहवें प्रस्तारमें जघन्य स्थिति एक समय अधिक सागरके दश भागोंमें सात भाग प्रमाण है और उत्कृष्ट स्थिति सागरके दश भागोंमें आठ भाग प्रमाण है ॥२५६।। अवक्रान्त नामक बारहवें प्रस्तारमें एक समय अधिक सागरके दश भागोंमें आठ भाग प्रमाण जघन्य स्थिति है और एक सागरके दश भागोंमें नौ भाग प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति विद्वानोंने कही है। विक्रान्त नामक तेरहवें प्रस्तारमें जघन्य स्थिति एक सागरके दश भागोंमें समयाधिक नौ भाग प्रमाण है और उत्कृष्ट स्थिति सागरके दश भागोंमें दशों भाग अर्थात् एक सागर प्रमाण है। इस प्रकार घर्मा नामक पहली पृथिवीके तेरह प्रस्तारोंमें जघन्य तथा उत्कृष्ट स्थितिका कथन किया । अब दूसरी पृथिवीके ग्यारह प्रस्तारों में स्थितिका वर्णन करते हैं ।।२५७-२५८।। दूसरी पथिवीके स्तरक नामक प्रथम प्रस्तारमें नारकियोंकी जघन्य आय एक समय अधिक एक सागर और उत्कृष्ट स्थिति एक सागर तथा एक सागरके ग्यारह अंशोंमें दो अंश प्रमाण १. रोरुके म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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