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________________ ९१४ भेदसे ३ भेद हैं २।१३४ गुणस्थान (पा) मोह और योग के निमित्तसे होनेवाला आत्माका क्रमिक विकास ३१७९ गुप्तफल्गु (व्य) ऋषभदेवका गणधर १२॥६४ गुपित(पा)योगोंका निग्रह करना १ मनोगुप्ति, २ वाग्गुप्ति, ३ कायगुप्ति ये तीन गुप्तियाँ हैं । २।१२७ गुरु = पाँच परमेष्ठी ११२८ गुरु = पिता २१।१२२ गुरु = बृहस्पति, पक्षमें आचार्य ग्राम = शारीर स्वरका भेद १९।१४८ ग्राम = वैण स्वरका एक भेद १९।१४७ ग्रेवेयक - हार ११११३ ग्रेवेयक ( भो) सोलह स्वर्गोंके ऊपर स्थित नौ पटल ३।१५० नैवेयक स्तूप (पा) समवशरणके स्तूप ५७।१०० गुरुत्दं = पितापना २०१५ गुह्यक = देव विशेष ५९।४३ गूढदत्त (व्य) आगामी चक्रवर्ती ६०१५६४ गृहाङ्ग = एक कल्पवृक्ष ७८० गृहीता गृहीतेत्वरिकागमन (पा) ब्रह्मचर्याणुव्रतका अतिचार ५८।१७४ गोकुल (भौ) मथुरासे कुछ दूरी पर स्थित एक प्रदेश ११९१ गोतम (व्य) लवणसमुद्रके अन्त गत गोतम द्वीपका अधि ठाता देव ५।४७० गोतम (भौ) लवणसमुद्र के मध्य में स्थित एक द्वीप ५१४७० गोतम (व्य) सौधर्मेन्द्रका आज्ञा__ कारी एक देव ४१।१७।। गोत्र (पा) उच्च-नीच व्यवहार का कारण ५८।२१८ गोमुख (व्य) चारुदत्तका मित्र २१११३ ६ गोमेद (भौ) रत्नप्रभाके खर भागका छठवां भेद ४/५३ हरिवंशपुराणे गोवर्धन (व्य) एक श्रुतकेवली आचार्य श६१ गोविन्द (व्य) श्रीकृष्ण ४४।५१ गौतम (व्य) भगवान् महावीर के प्रथम गणधर २१८९ गौतम (व्य) कृष्णका पुत्र ४८७० गौतम(व्य)एक राजा ५०११३१ गौतम (व्य) कापिष्ठलायन और अनुमतिका पुत्र १८।१०४ गौतम (व्य) समुद्रविजयका पुत्र ४८।४४ गौतम (व्य) गौतम नामका देव १९९ गौतम (व्य ) वसुदेवने सुग्रीव गान्धर्वाचार्यको अपना कृत्रिम गोत्र बताया 'गौतम' १९।१३० गौरमुण्ड(व्य)अमितगति विद्या धरका मित्र २११२३ गौरिक ( भौ) वि. उ. नगरो २२१८८ गौरिक = अदिति देवीके द्वारा दत्त विद्याओंका एक निकाय २२१५७ गौरिक विद्याधर =विद्याधरोंकी एक जाति २६१६ गौरिकूट (भौ) वि. द. नगरी २२९७ गौरी(व्य) वीतभय नगरके राजा मेरु और चन्द्रमतीको पुत्री कृष्णको पट्टराज्ञी ४४।१४ गौरी = एक विद्या २७४१३१ गौरी = एक यिद्या २२॥६२ ग्राहवती ( भौ) विदेह क्षेत्रकी विभंगा नदी ५।२३९ ग्राम-समूह २०५७ ग्राम (पा) बाड़ीसे घिरा छोटा गाँव २।३ [घ] घन = काँसेके झाँझ-मजीरा आदि १९।१४२ घनवात (पा) एक वातवलय ४।३३ घनोदधि (पा) एक वातवलय ४।३३ घमा ( भो) रत्नप्रभाका रूढ़ि नाम ४।४६ धर्मा ( भौ) रत्नप्रभा पृथिवी ४।२१८ घाट (भौ) शर्कराप्रभा पृथिवीके पंचम प्रस्तारका इन्द्रक विल ४।१०९ घातिसंघातं (पा) ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय इन चार कर्मोका समूह २०५९ घृतवर द्वीप (भौ) छठवाँ द्वीप ५।६१५ घृतवर समुद्र (भौ) छठवाँ समुद्र घोष (पा) अहीरोंकी वसति २।३ [च] चक्र (भौ) सानत्कुमार युगलका सातवाँ इन्द्रक ६१४८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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