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________________ ८११ षट्षष्टितमः सर्गः व्युत्सृष्टापरसंघसंततिबृहत्पुन्नाटसंघान्वये व्याप्तः श्रीजिनसेनसूरिकविना लामाय' बोधेः पुनः । दृष्टोऽयं हरिवंशपुण्यचरितश्रीपर्वतः सर्वतो ग्याप्ताशामुखमण्डलः स्थिरतरः स्थयात् पृथिव्यां चिरम् ॥५४॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती गुरुपादकमलवर्णनो नाम षट्षष्टितमः सर्गः ॥६६॥ इति श्रीहरिवंशपुराणं संपूर्णम् । के शान्तिनाथ भगवान्के शान्तिपूर्ण मन्दिरमें इसकी रचना पूर्ण हुई ॥५२-५३॥ अन्य संघोंकी सन्ततिको पीछे छोड़ देनेवाले अत्यन्त विशाल पुन्नाट संघके वंशमें उत्पन्न हुए श्रीजिनसेन कविने रत्नत्रयके लोभके लिए जिस हरिवंशपुराणरूपी श्रीपर्वतको प्राप्त कर उसका अच्छी तरह अवलोकन किया था, सब ओरसे दिशाओंके मुखमण्डलको व्याप्त करनेवाला वह सुदृढ़ श्रीपर्वत पृथिवीमें चिरकाल तक स्थिर रहे ॥५४॥ इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्यरचित हरिवंशपुराणमें गुरुओंके चरण-कमलोंका वर्णन करनेवाला छयासठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१६॥ गल्लीलालतनूजेन जानक्युदरसंभुवा । दयाचन्द्रस्य शिष्येण पन्नालालेन सूरिणा ॥१॥ फाल्गुनामिधमासस्य शिशिरर्तुविशोमिनः । शुक्लपक्षतृतीयायां तारापतिसुवासरे ॥२॥ निशायाः प्रथमे यामे नक्षत्रनिचयाचिते । रसकर्मयुगव्याख्ये, (२४८६) वीरनिर्वाणवत्सरे ॥३॥ हरिवंशपुराणस्य जिनसेनकृतेरियम् । टीका समापिता, भूयाद् विद्वजनमनोमुदे ॥४॥ नानाशास्वरहस्यज्ञान् विबुधान प्रार्थयाम्यहम् । क्षमध्वं स्खलनं यूयं यदत्र विहितं मया ॥५॥ १. बोधे म., क.। २. श्रीपार्वतः ङ. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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