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________________ पञ्चषष्टितमः सर्गः शार्दूलविक्रीडितम् तीर्थे नेमिजिनस्य तत्र वहति व्यामोहविच्छेदने संजाते वरदत्तनामनि सुनौ कैवल्यचक्षुष्मति । राजासी हरिवंशसंततिधरो धीरो धरायाः सुतो दधे राज्यधुरां धुरंधरधराधीशश्रियं धारयन् ॥ ५९ ॥ Jain Education International इत्यरिष्टनेमिपुराण संग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृतो भगवन्निर्वाणवर्णनो नाम पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥ ६५ ॥ O बाधक प्राणियों के अत्यधिक स्नेहसम्बन्धी मोहको धिक्कार हो ॥ ५८ ॥ तदनन्तर मोहको नष्ट करनेवाले नेमिजिनेन्द्रके उस प्रचलित तीर्थ में वरदत्त नामक मुनिको केवलज्ञान हुआ और हरिवंशको सन्ततिको धारण करनेवाला धीर-वीर जरत्कुमार धुरन्धर राजलक्ष्मीकी रक्षा करता हुआ राज्यका भार सँभालने लगा ||५९|| इस प्रकार अरिष्टनेमिपुराण के संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराण में भगवान् नेमिनाथके निर्वाणका वर्णन करनेवाला पैंसठवाँ सर्ग समाप्त हुआ ।। ६५॥ O ८०३ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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