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________________ ७८० हरिवंशपुराणे कायवाङ्मनसयोगभेदवानास्त्रवो मवति पुण्यपापयोः । कर्मबन्धदृढशृङ्खलश्चिरं संसरत्यसुभृदुग्रसंसृतौ ॥१५॥ स्याद् द्विधास्रवनिरोधलक्षणः संवरः समितिगुप्तिपूर्वकैः । संवरे सति सनिर्जरेऽसुभृत्सिद्ध्यति स्वकृतकर्मसंक्षयात् ॥८६॥ दुर्गतिष्वकुशलानुवन्धिना संयमान्नु कुशलानुवन्धिनी । निर्जरा निरनुबन्विनी च सा चिन्तिता परमयोगिनामुना ॥८७॥ लोकसंस्थितिरनाद्यनन्तिकालोकगर्भबहुमध्यभागभाक् । अत्र ही षडसुकायसंहतिदुःखिनीति खलु लोकचिन्तना ॥४८॥ स्थावरे उसकुलेऽखिलेन्द्रियैः पूर्णतादिषु सुधर्मलक्षणा । बोधिलब्धिरति दुर्लभा भवेत्सत्समाधिमरणाप्तिसत्फला ॥८९॥ धर्म एष जिलमाषितः शिवप्राप्तिहेतुरवधादिलक्षणः । त्यागतोऽस्य मवदुःखितेत्यनुप्रेक्षिकान्त्य शुभचिन्तनात्मिकाः ॥९॥ इत्यनुश्रुतमनूलधीरनुप्रैक्षिकाधमनुमावयन् मुहः । भ्रातृमोहमजबजयन्मुनिः सद्विविंशतिपरीषहद्विषः ॥११॥ वियोगके समय शोकको प्राप्त होगा और संयोगके समय राग करेगा ? ॥८४॥ काययोग, वचनयोग और मनोयोग यह तीन प्रकारका योग ही आस्रव है। इसीके निमित्तसे आत्मामें पुण्य और पापकर्मका आगमन होता है। आस्रवके बाद यह जीव कर्मबन्धनरूप दृढ़ सांकलसे बद्ध होकर भयंकर संसारमें चिरकाल तक भ्रमण करता रहता है ||८५|| द्रव्यास्रव और भावास्रवरूप दोनों प्रकारके आसवका रुक जाना संवर है। यह संवर गति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा. परीषहजय और चारित्रसे होता है। निर्जराके साथ-साथ संवरके हो जानेपर यह जोव स्वकृत कर्मोका क्षयकर सिद्ध हो जाता है ॥८६॥ अनुबन्धिनी और निरनुबन्धिनोके भेदसे निर्जराके मूल में दो भेद हैं। फिर अनुबन्धिनी निर्जराके अकुशला और कुशलाके भेदसे दो भेद हैं। नरकादि गतियोंमें जो प्रतिसमय कर्मोंकी निर्जरा होती है वह अकुशलानुबन्धिनी निजंरा है और संयमके प्रभावसे देव आदि गतियोंमें जो निजंरा होती है वह कुशलानुबन्धिनी निर्जरा है। जिस निर्जराके बाद पुनः कर्मोका बन्ध होता रहता है वह अनुबन्धिनो निर्जरा है और जिस निर्जराके बाद पूर्वकृत कर्म खिरते तो हैं पर नवीन कर्मोका दन्ध नहीं होता उसे निरनुबन्धिनी निर्जरा कहते हैं। परम योगी बलदेव मनिराजने इसी निरनदन्धिनी अनुप्रेक्षाका दिन्तवन किया था ॥८७।। लोककी स्थिति अनादि, अनन्त है, यह लोक अलोकाकाशके ठीक मध्यमें स्थित है। इस लोकके भीतर छह कायके जीव निरन्तर दुःख भोगते रहते हैं, ऐसा चिन्तवन करना लोकानुप्रेक्षा है ।।८८|| प्रथम तो निगोदसे निकलकर अन्य स्थावरोंमें उत्पन्न होना ही दुर्लभ है फिर सपर्याय पाना दुर्लभ है, त्रसों में भी इन्द्रियोंकी पूर्णता होना दुर्लभ है और इन्द्रियोंकी पूर्णता होनेपर भी समीचीन धर्म जिसका लक्षण है एवं उत्तम समाधिका प्रास होना जिसका फल है ऐसी बोधि अर्थात् रत्नत्रयको प्राप्ति होना अत्यन्त दुर्लभ है ।।८९|| जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहा हुआ यह अहिंसादि लक्षण धर्म ही मोक्षप्राप्तिका कारण है। इससत्याग करनेसे संसारका दःख प्राप्त होता है-इस प्रकार चिन्तवन करना सो अन्तिम धर्मानुप्रेक्षा है ।।२०।। इस प्रकार परम्परासे प्रसिद्ध बारह अनुप्रेक्षाओंका बार-बार चिन्तवन करनेवाले उत्कृष्ट बुद्धिके धारक बलदेव मुनिराजने बाईस परीषहरूपी शत्रुओंको जोतकर भाईके मोहको जीत लिया ।।९।। १. परमयोगिनी शुमा स. । २. स्थावरेऽत्र कुशलेऽखिलेन्द्रियैः क., ङ. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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