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________________ हरिवंशपुराणे इत्युक्त सोऽब्रवीदस्ति हरिवंशोद्भवो नृपः । वसुदेव इति ख्यातः पिता यो हलिचक्रिणोः ॥३८॥ सूनुर्जरत्कुमारोऽस्मि तस्याहमतिवल्लभः । एकवीरो भ्रमाम्यत्र वने भीरुदुरासदे ॥३९॥ सोऽहं नेमिजिनादेशमीरुर्वनचरैर्वने । द्वादशाब्दप्रमाणं च वसाम्यत्र प्रियानुजः ॥१०॥ इयन्तं वसता कालमरण्ये वचनं मया । आर्यलोकस्य कस्यापि न श्रुतं को भवानिह ॥४१॥ इति श्रुत्वा हरित्विा भ्रातरं स्नेहकातरः । एह्यहि भ्रातरत्रेति संभ्रमेण तमाह्वयत् ॥४२॥ सोऽपि ज्ञात्वानुजं प्राप्तो हाकारमुखराननः । क्षितिक्षिप्तधनुर्बाणो निपस्यास्थाच्च पादयोः ॥४३॥ उत्थाप्य तं हरिः प्राह कण्ठलग्नं महाशुचम् । मातिशोकं कृथा ज्येष्ठ दुर्लक्या भवितव्यता ।।४४॥ प्रमादस्य निरासाय निरस्तसुखसंपदा । चिरं पुरुषशार्दूल सेविता वनवासिता ॥४५॥ करोति सजनो यत्नं दुर्यशःपापमीरुकः । देवे तु कुटिले तस्य स यत्नः किं करिष्यति ॥४६॥ ततस्तेन हरिः पृष्टो वनागमनकारणम् । आदितोऽकथयवृत्तं द्वारिकादाहदारुणम् ॥४७॥ श्रुत्वा गोत्रक्षयं सोऽपि प्रलापमुखरोऽवदत् । हा भ्रातः कृतमातिथ्यं मया ते चिरदर्शनात् ॥४८॥ किं करोमि व गच्छामि व लभे चित्तनिर्वृतिम् । दुःखं च दुर्यशो लोके हन्त्रा ते हा मयार्जितम् ॥४९॥ इत्यादि प्रलपनुक्तः कृष्णेनासौ सुचेतसा । प्रलापं त्यज राजेन्द्र कृत्स्नं स्वकृतभुग जगत् ॥५०॥ श्रीकृष्णके इस प्रकार कहनेपर जरत्कुमारने कहा कि हरिवंशमें उत्पन्न हुए एक वसुदेव नामके राजा हैं जो बलदेव और कृष्णके पिता हैं। मैं जरत्कुमार नामका उन्हींका अतिशय प्यारा पुत्र हूँ। जहां कायर मनुष्य प्रवेश नहीं कर सकते ऐसे इस वनमें मैं अकेला ही वीर घूमता रहता हूँ। नेमिजिनेन्द्रने आज्ञा की थी कि जरत्कुमारके द्वारा कृष्णका मरण होगा सो मैं उनकी इस आज्ञासे डरकर बारह वर्षसे इस वनमें रह रहा हूँ। मुझे अपना छोटा भाई कृष्ण बहुत ही प्यारा था, इसलिए इतने समयसे यहाँ रह रहा हूँ, इस बीचमें मैंने किसी आर्यका नाम भी नहीं सुना। फिर आप यहाँ कौन हैं ? ।।३८-४१॥ जरत्कुमारके यह वचन सुन कृष्णने जान लिया कि यह हमारा भाई है तब स्नेहसे कातर हो उन्होंने 'हे भाई! यहाँ आओ, यहाँ आओ' इस प्रकार संभ्रमपूर्वक उसे बुलाया ॥४२॥ जरत्कुमारने भी जान लिया कि यह हमारा छोटा भाई है तब 'हाय हाय' शब्दसे मुखको शब्दायमान करता हुआ वह वहां आया और धनुष-बाणको पृथिवीपर फेंक श्रीकृष्णके चरणोंमें आ गिरा ॥४३। कृष्णने उसे उठाया तो वह कण्ठमें लगकर महाशोक करने लगा । कृष्णने कहा कि हे बड़े भाई ! अत्यधिक शोक मत करो, होनहार अलंघनीय होती है ॥४४॥ हे श्रेष्ठ पुरुष ! आपने प्रमादका निराकरण करनेके लिए समस्त सुखसम्पदाओंको छोड़ चिरकाल तक वनमें निवास करना स्वीकृत किया। अपयश और पापसे डरनेवाला सज्जन पुरुष बुद्धिपूर्वक प्रयत्न करता है परन्तु दैवके कुटिल होनेपर उसका वह यत्न क्या कर सकता है ? ।।४५-४६॥ तदनन्तर जरत्कुमारने कृष्णसे वनमें आनेका कारण पूछा तो उन्होंने प्रारम्भसे लेकर द्वारिकादाह तकका सब दारुण समाचार कह सुनाया ॥४७॥ गोत्रका क्षय सुनकर जरत्कुमार प्रलापसे मुखर होता हुआ बोला कि हा भाई ! चिरकालके बाद आप दिखे और मैंने आपका यह अतिथि-सत्कार किया ! ॥४८॥ मैं क्या करू ? कहाँ जाऊँ ? चित्तकी शान्ति कहाँ प्राप्त करूं? हा कृष्ण ! तुझे मारकर मैंने लोकमें दुःख तथा अपयश दोनों प्राप्त किये ॥४९॥ इत्यादि रूपसे विलाप करते हुए जरत्कुमारसे उत्तम हृदयके धारक कृष्णने कहा कि हे राजेन्द्र ! प्रलापको १. गोत्रक्षथः म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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