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________________ ७६२ हरिवंशपुराणे परं हन्मीति संध्यातं लोहपिण्डमुपाददत् । दहत्यात्मानमेवादौ कषायवशगस्तथा ॥१०॥ संसारान्तकरं पुंसामेकेषां परमं तपः । द्वैपायनस्य तज्जातं दीर्घसंसारकारणम् ॥१०॥ जन्तोः को वापराधोऽत्र स्वकर्मवशवर्तिनः। यत्नवानपि यजन्तुर्मोह्यते मोहवैरिणा ॥१०५॥ 'अपाक्रियेतापि परः कथंचिदतितिक्षुणा' । उपक्रियेत यद्यात्मा तथेहपरलोकयोः ॥१०६।। परदुःखविधानेन यत्स्वदुःखपरम्परा । अवश्यम्माविनी तस्मात्तितिक्षैवातिभाव्यताम् ॥१०७।। शार्दूलविक्रीडितम् क्रोधान्धेन विधेर्वशेन नगरी द्वैपायनेनाखिला बालस्त्रीपशुवृद्ध लोककलिता द्वाराकुला द्वारिका । मासैः षड्मिरशेषिता विलसिता संत्यज्य जैनं वचो धिक क्रोधं स्वपरापकारकरणं संसारसंवर्धनम् ।।१०८।। इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती द्वारावतीविनाशवर्णनो नामैकषष्टितमः सर्गः ॥६॥ संसारको बढ़ाता है ॥१०२।। जिस प्रकार तपाये हुए लोहेके पिण्डको उठानेवाला मनुष्य पहले अपने-आपको जलाता है पश्चात् दूसरेको जला सके अथवा नहीं। उसी प्रकार कषायके वशीभूत हुआ प्राणी 'दूसरेका घात करूँ' इस विचारके उत्पन्न होते ही पहले अपने-आपका घात करता है पश्चात् दूसरेका घात कर सके या नहीं कर सके ।।१०३।। किन्हीं मनुष्योंके लिए यह परम तप संसारका अन्त करनेवाला होता है पर द्वैपायन मुनिके लिए दीर्घ संसारका कारण हुआ ॥१०४॥ अथवा इस संसारमें अपने कर्मके अनुसार प्रवृत्ति करनेवाले प्राणीका क्या अपराध है ? क्योंकि यत्न करनेवाला प्राणी भी मोहरूपी वरीके द्वारा मोहको प्राप्त हो जाता है ॥१०५॥ असहनशील परुष दसरेका अपकार किसी तरह कर भी सकता है परन्तु उसे अपने-आपका तो इस लोक और परलोकमें उपकार ही करना चाहिए ।।१०६।। क्योंकि दूसरोंको दुःख पहुँचानेसे अपनेआपको भी दुःखकी परम्परा प्राप्त होती है, इसलिए क्षमा अवश्यम्भावी है-अवश्य ही धारण करने योग्य है ऐसा निश्चय करना चाहिए ॥१०७|| गौतम स्वामी कहते हैं कि देखो, विधिके वशीभूत हुए क्रोधसे अन्धे द्वैपायनने जिनेन्द्र भगवान्के वचन छोड़कर बालक, स्त्रो, पशु और वृद्धजनोंसे व्याप्त एवं अनेक द्वारोंसे युक्त शोभायमान द्वारिका नगरीको छह मासमें भस्म कर नष्ट कर दिया सो निज और परके अपकारका कारण तथा संसारको बढ़ानेवाले इस क्रोधको धिक्कार है ॥१०८॥ इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें द्वारिकाके नाशका वर्णन करनेवाला इकसठवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥६॥ १. अपि क्रियेतापि म.। २. अविचक्षणः ग., अतितिक्षणः म., ख., ङ.। ३. भाष्यताम् म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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