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________________ ७६० हरिवंशपुराणे दिव्येन दह्यमानायां दहनेन तदा पुरि । नूनं वापि गता देवा दुर्वास भवितव्यता ॥७॥ अन्यथा देवराजस्य राजराजेन शासनात् । निर्मिता रक्षिता चासौ दह्यते कथमग्निना ॥७८|| रक्षतां बलकृष्णौ मः चिरेणाग्निभयादितान् । इति स्त्रीबालवृद्धानामालापा ययुराकुलाः ॥७९॥ आकुलो बालकृष्णौ च भित्वा प्राकारमम्बुधेः । विध्यापयितुमालग्नौ प्रवाहस्तं हुताशनम् ॥८॥ सागराम्बुहलाकृष्टं हलिना बलशालिना। जज्वाल ज्वलनस्तेन तेलभावमुपेयुषा ॥८॥ असाध्यतां विदित्वाग्नेर्जनन्यौ जनकं जनम् । सुबहं रथमारोप्य संयोज्य गजवाजिनः ॥४२॥ रथं नोदयतोः क्षोण्या रथचक्राणि पङ्कवत् । निमजन्ति विपरकाळे व गजा वाजिनः क्व च ॥८३॥ स्वयमेव रथं दोामाकृष्य प्रयतोस्तयोः । निरुद्धः कीलयित्वासाविन्द्रकोलेन पापिना ॥४४॥ अवष्टभ्नाति पादेन यावत्कीलं हलायुधः । पिहितं गोपुरद्वारं तावत्येन कोपिना ॥५॥ कपाटं पादघातेन ताभ्यां पातितमाशु तत् । द्विषोक्तं निर्गमोऽन्यस्य युवाभ्यां नानुविद्यते ॥८६॥ ततः पित्रा च मातृभ्यां पुत्रौ यातमितीरिती। विनिश्चित्योपसंहारमात्मीयमिति दुःखिभिः ॥१७॥ भवतोः जीवतोः पुत्रौ कदाचिद्वंशसन्ततिः । न क्राम्येदप्यतो घातमिति तद्वाक्यमस्तकौ ॥४८॥ तान्प्रशाम्य गतौ दीनौ दुःखितौ दुःखपीडितान् । प्रपत्य पादयोर्यातौ गुरुवाक्यकगै पुरः ॥८॥ अग्निके द्वारा जब नगरी जल रही थी तब जान पड़ता था कि देव लोग कहीं चले गये थे सो ठीक ही है क्योंकि भवितव्यता दुनिवार है ।।७७।। अन्यथा इन्द्रकी आज्ञासे कुबेरने जिस नगरीकी रचना को थी तथा कुबेर ही जिसकी रक्षा करता था वह नगरी अग्निके द्वारा कैसे जल जाती? ||७८|| 'हे बलदेव और कृष्ण ! हम लोग चिरकालसे अग्निके भयसे पीड़ित हो रहे हैं, हमारी रक्षा करो' इस प्रकार स्त्री, बालक और वद्धजनोंके घबराहटसे भरे शब्द सर्वत्र व्याप्त हो रहे थे ।।७९|| घबड़ाये हुए बलदेव और कृष्ण कोट फोड़कर समुद्रके प्रवाहोंसे उस अग्निको बुझाने लगे ।।८०॥ बलशाली बलदेवने अपने हलसे समुद्र का जल खींचा परन्तु वह तेलरूपमें परिणत हो गया और उससे अग्नि अत्यधिक प्रज्वलित हो उठी ||८१॥ जब बलदेव और कृष्णको इस बातका निश्चय हो गया कि अग्नि असाध्य है-बुझायो नहीं जा सकती तब उन्होंने दोनों माताओंको, पिताको तथा अन्य बहुत-से लोगोंको रथपर बैठाकर तथा रथमें हाथी और घोड़े जोतकर रथको पृथिवीपर चलाया परन्तु रथके पहिये जिस प्रकार कीचड़में फंस जाते हैं उस प्रकार पथिवो में फंस गये सो ठीक ही है क्योंकि विपत्तिके समय कहाँ हाथी और कहाँ घोड़े काम आते हैं ? ।।८२-८३॥ हाथी और घोड़ोंको बेकार देख जब दोनों भाई स्वयं ही भुजाओंसे रथ खींचकर चलने लगे तब उस पापी देवने वज्रमय कीलसे कोलकर रथको रोक दिया ।।८४॥ जबतक बलदेव पैरके आघातसे कीलको उखाड़ते हैं तबतक उस क्रोधी दैत्यने नगरका द्वार बन्द कर दिया ॥८५।। जब दोनों भाइयोंने पैरके आघातसे द्वारके कपाटको शीघ्र ही गिरा दिया तबतक शत्रुने कहा कि तुम दोनोंके सिवाय किसी अन्यका निकलना नहीं हो सकता ॥८६।। तदनन्तर अब हम लोगोंका विनाश निश्चित है यह जानकर दोनों माताओं और पिताने दुःखी होकर कहा कि 'हे पुत्रो ! तुम जाओ। कदाचित् तुम दोनोंके जीवित रहते वंश घातको प्राप्त नहीं होगा।' इस प्रकार गुरुजनोंके वचन मस्तकपर धारण कर दोनों भाई अत्यन्त दुःखी हुए तथा दुःखसे पीड़ित दीन माता-पिताको शान्त कर और उनके चरणोंमें गिरकर उनके वचनोंको मानते हए नगरसे बाहर निकल आये ||८७-८९|| १. रक्षता म. । २. च. ख.। ३. भयादिताः म., ख.। ४. वज्रवत्कीलकेन ( ङ. टि.)। ५. पात क., ख., ङ.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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