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________________ षष्टितमः सर्गः मलिः पञ्चशतैः सिद्धः शान्तिर्नवशतैः सह । सैकैरष्टशतैर्धर्मो द्वादशः सैकषट्शतैः ॥ २८३ ॥ सहस्त्रैर्विमलः षड्भिरनन्तस्तैस्तु सप्तभिः । सप्तमः पञ्चशत्यामा पद्माभोऽष्टशतैस्त्रिभिः ॥ २८४॥ वृषो दशसहखैस्तु मुनिभिर्मुक्तिमाश्रितः । प्रत्येकं तु जिनाः शेषाः सहस्रेण समन्विताः ॥ २८५ ॥ मरतश्चक्रवर्त्याद्यः सगरो मघवस्ततः । सनत्कुमारनामान्यः शान्तिः कुन्धुररस्तथा ॥ २८६ ॥ सुभूमश्च महापद्मो हरिषेणो जयोऽपरः । ब्रह्मदत्तश्च षट्खण्डनाथा द्वादशचक्रिणः ॥ २८७ ॥ त्रिपृष्टश्च द्विष्टश्च स्वयंभूः पुरुषोत्तमः । पुरुषोपपदौ सिंहपुण्डरीकौ प्रचण्डकौ ॥ २८८ ॥ दत्तो नारायणो कृष्णो वासुदेवा नवोदिताः । त्रिखण्ड मरताधीशाः पराखण्डितपौरुषाः ॥ २८९ ॥ विजयोऽचलः सुधर्माख्यः सुप्रमश्च सुदर्शनः । नान्दी च नन्दिमित्रश्च रामः पद्मो बला नव ॥ २९० ॥ अश्वग्रीवो भुवि ख्यातस्तारको मेरुकस्तथा । निशुम्भः शुम्भदम्भोजवदनो मधुकैटभः ॥ २९१॥ बलिः प्रहरणाभिख्यो रावणः खेचरान्वयः' | भूचरस्तु जरासन्धो नवैते प्रतिशत्रवः ॥ २९२॥ ऊर्ध्वगा बलदेवास्ते निनिंदाना भवान्तरे । अधोगाः सनिदानास्तु केशवाः प्रतिशत्रवः ॥ २९३॥ वृषभे भरतश्चक्री सगरोऽप्यजिते जिने । मघवांस्तुर्यश्चकी च धर्मशान्त्यन्तरे मतौ ॥२९४॥ निजं जिनान्तरं ज्ञेयं शान्तिकुन्थ्वरचक्रिणाम् । चक्रवर्ती सुभूमोऽभूदरमल्लि जिनान्तरे ॥ २९५॥ मुनिसुव्रतसल्ल्यन्तर्महापद्मः प्रकीर्तितः । मुनिसुव्रतनम्यन्तर्हरिषेणस्तु चक्रभृत् ॥ २९६॥ नमिनेम्यन्तरे चक्री जयसेनोऽभवत्ततः । ब्रह्मदत्तोऽपि निर्दिष्टो नेमिपाश्र्वजिनान्तरे ॥ २९७ ॥ मल्लिनाथ पाँच सी, शान्तिनाथ नो सो, धर्मनाथ आठ सौ एक, वासुपूज्य छह सौ एक, विमलनाथ छह हजार, अनन्तनाथ सात हजार, सुपाश्वनाथ पाँच सौ, पद्मप्रभ तीन हजार आठ सौ, वृषभनाथ दश हजार और शेष तीर्थंकर एक-एक हजार मुनियोंके साथ मोक्षको प्राप्त हुए हैं ।।२८३ - २८५ ॥ ७२७ भरत, सगर, मघवा, सनत्कुमार, शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ, सुभूम, महापद्म, हरिपेण, जय और ब्रह्मदत्त ये बारह चक्रवर्ती छह खण्डोंके स्वामी हुए ||२८६ - २८७॥ त्रिपृष्ठ, द्विपृष्ठ, स्वयम्भू, पुरुषोत्तम, पुरुषसिंह, पुरुष पुण्डरीक, (पुण्डरीक) दत्त, नारायण (लक्ष्मण) और कृष्ण ये नो वासुदेव कहे गये हैं । ये तीन खण्ड भरतके स्वामी होते हैं तथा इनका पराक्रम दूसरोंके द्वारा खण्डित नहीं होता ॥ २८८- २८५९॥ विजय, अचल, सुधमं, सुप्रभ, सुदर्शन, नान्दी, नन्दिमित्र, राम और पद्म ये नौ बलभद्र हैं ||२९० || अश्वग्रीव, पृथिवीमें प्रसिद्ध तारक, मेरुक, निशुम्भ, सुशोभित कमलके समान मुखवाला मधुकैटभ, बलि, प्रहरण, विद्याधर वंशज रावण और भूमिगोचरी जरासन्ध ये नौ प्रतिनारायण हैं ||२९१ - २९२ ।। बलभद्र ऊर्ध्वगामी - स्वर्गं अथवा मोक्षगामी होते हैं तथा भवान्तरमें कोई निदान नहीं बाँधते और नारायण अधोगामी होते हैं एवं भवान्तर में निदान बाँधते हैं ||२९३॥ चक्रवर्ती भरत वृषभनाथ के समयमें हुआ, सगर चक्रवर्ती अजितनाथके कालमें हुआ, मघवा और सनत्कुमार धर्मनाथ तथा शान्तिनाथके अन्तरालमें हुए । शान्ति, कुन्थु और अरनाथ चक्रवर्ती काल अपना-अपना अन्तराल काल है । सुभूम चक्रवर्ती अरनाथ और मल्लिनाथके अन्तराल में हुआ । महापद्म मल्लिनाथ और मुनिसुव्रतनाथके अन्तरालमें हुआ । हरिषेण, मुनिसुव्रत १. खेचरान्वयाः म. । २. अणिदाणगदा सब्वे बलदेवा केसवा णिदागगदा । उडदंगामी सव्वे बलदेव केसवा अधोगामी ॥। १४३६ . प्र. ४ अधिकार Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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