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________________ षष्टितमः सर्गः अथ धर्मकथाछेदे प्रणिपत्य जिनेश्वरम् । कृताञ्जलिरपृच्छत् सा देवकी विनयं श्रिता ॥१॥ भगवन् मवने मेऽद्य जातरूपमनोहरम् । मुनियुग्मं प्रविश्य 'त्रिरुपर्युपरि भुक्तवान् ॥२॥ भगवन् भुक्तिवेलायामेकस्यामेकभुक्तये । बहुकृत्वो गृहं वेकं यतयः प्रविशन्ति किम् ॥३॥ अथातिशयरूपत्वाधतियुग्मत्रयं मया । भ्रान्त्या नालक्षि मे स्नेहो देहजेष्विव तेष्वभूत् ॥४॥ इत्युक्तेऽकथयन्नाथस्तनयास्ते षडप्यमी । युग्मत्रयतया सूता मवस्या कृष्णपूर्वजाः ॥५।। देवेन रक्षिताः कंसात् सुदृष्टयलकयोः पुनः । सुतत्वेन च वृद्धास्ते पुरे भदिलनामनि ॥६॥ धर्म श्रुत्वा समं सर्वे मम शिष्यत्वमागताः । कृत्वा कर्मक्षयं सिद्धिं यास्यन्त्यत्रैव जन्मनि ॥७॥ स्नेहोऽपत्यकृतोऽमीषु मवत्याः समभूदतः । धर्मचारिषु सर्वेषु स्नेहः किमुत सूनुषु ॥८॥ प्रणनाम ततस्तुष्टा देवकी देहजान्मुनीन् । यादवाश्च समस्तास्ते कृष्णाधास्तुष्टुवुर्नताः ॥९॥ प्रणम्यात्ममवान् पृष्टो जिनेन्द्रः सत्यमामया । यदुलोकामराध्यक्षं दिव्यचक्षुर्जगाविति ॥१०॥ प्राग्मद्रिलपुरेऽत्राभून्मरीचिकपिलासुतः । काव्यकृत्पण्डितंमन्यो विप्रो मुण्डशलायनः ॥११॥ अथानन्तर धर्मकथा पूर्ण होनेपर विनयको धारण करनेवाली देवकीने हाथ जोड़कर भगवान्को नमस्कार किया और उसके बाद यह पूछा कि भगवन् ! आज सुवर्णके समान सुन्दर दो मुनियोंका युगल मेरे भवनमें तीन बार आया और फिर-फिरसे उसने, तीन बार आहार लिया। हे प्रभो! जब मनियोंके भोजनकी बेला एक है और एक ही बार वे भोजन करते हैं तब मनि एक ही घरमें अनेक बार क्यों प्रवेश करते हैं ? ॥१-३॥ अथवा यह भी हो सकता है कि वह तीन मुनियोंका युगल हो और अत्यन्त सदश रूप होनेके कारण मैं भ्रान्तिवश उन्हें देख नहीं सकी हूँ। परन्तु इतना अवश्य है कि मेरा उन सबमें पुत्रोंके समान स्नेह उत्पन्न हुआ था ॥४॥ देवकीके इस प्रकार कहनेपर भगवान्ने कहा कि ये छहों मुनि तेरे पुत्र हैं और कृष्णके पहले तीन युगलके रूपमें तूने इन्हें उत्पन्न किया था ॥५॥ देवने कंससे इनको रक्षा की और भद्रिलपुरमें सुदृष्टि सेठ तथा अलका सेठानीके यहां पुत्ररूपसे इनका लालन-पालन हुआ ॥६॥ धर्म श्रवण कर ये सबके सब एक साथ मेरी शिष्यताको प्राप्त हो गये-मुनि हो गये और कर्मोंका क्षय कर इसी जन्ममें सिद्धिको प्राप्त होंगे ॥७॥ तेरा इन सबमें जो स्नेह हुआ था वह अपत्यकृत थापुत्र होनेसे किया गया था सो ठीक ही है क्योंकि समस्त धर्मात्मा जनोंमें प्रेम होता है फिर जो पुत्र होकर धर्मात्मा हैं उनका तो कहना ही क्या है ? ॥८॥ तदनन्तर देवकीने सन्तुष्ट होकर उन पुत्ररूप मुनियोंको नमस्कार किया तथा कृष्ण आदि समस्त यादवोंने नम्रीभूत होकर उनकी स्तुति की ॥९॥ तत्पश्चात् कृष्णकी पट्टरानी सत्यभामाने भगवान्को प्रणाम कर अपने पूर्वभव पूछे । उत्तरमें दिव्य नेत्र-केवलज्ञानके धारक भगवान् यादवों और देवोंके समक्ष इस प्रकार उसके पूर्वभव कहने लगे ॥१०॥ पहले भद्रिलपुर नगरमें मण्डशलायन नामका एक ब्राह्मण रहता था जो मरीचि ब्राह्मण और कपिला ब्राह्मणीका पुत्र था, काव्यको रचनामें निपुण था और अपने-आपको पण्डित मानता १. वारत्रयम् । २. गृहेत्वेकम् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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