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________________ ७०५ एकोनषष्टितमः सर्गः तथाविधमहाभूत्या विहत्य स महीं जिनः । आगत्य समवस्थानेनोर्जयन्तमभूषयन् ॥१२५॥ इन्द्रायैनिदशैस्तस्मिन्नुपेन्द्रायैश्च यादवैः । द्वारिकापौरलोकेन सेव्यमानो जिनो बभौ ॥१२६॥ एकादश गणाधीशा वरदत्तादयस्तदा । श्रुतज्ञानसमुद्रान्तर्दशिनोऽत्र विरेजिरे ॥१२॥ चतुःशतानि तत्रान्ये मान्याः पूर्वधराः सताम् । एकादशसहस्राष्टशतसंख्यास्तु शिक्षकाः ॥१२८॥ शतान्यवधिनेवास्तु केवलज्ञानिनोऽपि च । ते पञ्चदशसंख्यानाः प्रत्येकमुपवर्णिताः ॥१२९॥ मस्या विपुलया युक्ता शतानि नव संख्यया । वादिनोऽष्टौ शतानि स्युरेकादश तु वैक्रियाः ॥१३०॥ चत्वारिंशत्सहस्राणि राजीमत्या सहायिकाः । लक्षकैकोनसप्तत्या सहस्रः श्रावकाः स्मृताः ॥१३१॥ षटत्रिंशच्च सहस्राणि लक्षाणां त्रितयं तथा । सम्यग्दर्शनसंशुद्धाः श्राविकाः श्रावकव्रताः ॥१३॥ पूर्ववत्तीर्थकृन्मेषस्तृषितान भव्यचातकान् । वर्षन् धर्मामृतं दिव्यं दिव्यध्वनिरतर्पयत् ॥१३३॥ इति दुरापमहोदयपर्वते जिनरवौ स्थितवत्यमितोदये। विकसति प्रकृताञ्जलिकुड़मलं सकललोकसरोजबुधाम्बुजम् ॥१३॥ इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृती भगवविहारवणंनो नाम कोनषष्टितमः सर्गः ॥५९॥ प्राप्त हो रहे थे ॥१२४॥ तदनन्तर उस प्रकारकी महाविभूतिके साथ पृथिवीपर विहार कर भगवान् ऊर्जयन्त गिरि-गिरनार पर्वतपर आये और समवसरणके द्वारा उसे सुशोभित करने लगे ॥१२५।। इन्द्रादिक देवों, कृष्ण आदि यादवों और द्वारिकावासी नागरिक जनोंसे जिनकी सेवा हो रही थी ऐसे भगवान नेमि जिनेन्द्र उस ऊर्जयन्त गिरिपर अत्यधिक सुशोभित हो रहे थे ॥१२६।। उस समय समवसरणमें श्रुतज्ञानरूपी समुद्रके भीतरी भागको देखनेवाले वरदत्त आदि ग्यारह गणधर सुशोभित थे ॥१२७॥ भगवान्के समवसरणमें सज्जनोंके माननीय चार सौ पूर्वधारी, एक हजार आठ सो शिक्षक, पन्द्रह सो अवधिज्ञानी, पन्द्रह सौ केवलज्ञानी, मौ सौ विपुलमति मनःपर्ययज्ञानी, आठ सो वादी और ग्यारह सो विक्रिया ऋद्धिके धारक मुनिराज थे ॥१२८-१३०॥ राजीमतीको साथ लेकर चालीस हजार आर्यिकाएं, एक लाख उनहत्तर हजार श्रावक और सम्यग्दर्शनसे शुद्ध तथा श्रावकके व्रत धारण करनेवाली तीन लाख छत्तीस हजार श्राविकाएं वहां विद्यमान २॥१३१-१३२॥ दिव्यध्वनिके धारक भगवान् तीथंकररूपी मेघ, धर्मरूपी दिव्य अमृतकी वर्षा करते हुए, प्यासे भव्यजीवरूपी चातकोंको पहलेकी तरह तृप्त करने लगे ॥१३३॥ इस प्रकार अपरिमित अभ्युदयके धारक नेमिजिनेन्द्ररूपी सूर्यके दुर्लभ महोदयसे युक्त ऊर्जयन्त पर्वतरूपी उदयाचलपर स्थित होते ही अंजलिरूपी कमलको धारण करनेवाले समस्त लोकरूपी सरोवरमें उत्पन्न हुए विद्वज्जनरूपी कमल प्रफुल्लित हो गये ॥१३४॥ इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंशपुराणमें भगवानके विहारका वर्णन करनेवाला उनसठवाँ सर्ग समाप्त हुआ॥५५॥ Jain Education Internatione For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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