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________________ अष्टपञ्चाशः सर्गः योगनिःप्रणिधानानि त्रीण्यनादरता च ते । पञ्च स्मृत्यनुपस्थानं स्युः सामायिकगोचराः ॥१८॥ अनवेक्ष्य मलोत्सर्गादानसंस्तरसंक्रमाः । स्युः प्रोषधोपवासस्य ते नै काम्यमनादरः ॥१८१॥ 'सचित्ताहारसंबन्धसन्मिश्राभिषवास्तु ते । उपमोगपरीभोगे दुष्पक्काहार एव च ॥१८२॥ ते सञ्चित्तेन निक्षेपः सचित्तावरणं परम् । व्यपदेशश्च मात्सयं कालातिक्रमतातिथौ ॥१८३॥ "आशंसे जीविते मृत्यौ निदानं दोनचेतसः। सुखानुबन्धमित्रानुरागी सल्लेखनामला: ॥१८४॥ सम्यग्ज्ञानादिवृद्ध धादिस्वपरानुग्रहेच्छया । दानं त्यागोऽतिसंर्गाख्यः प्रासुकं स्वस्य पात्रगम् ॥१५॥ विधिदेय विशेषाभ्यां दातृपात्रविशेषतः । भेदः फलस्य भूम्यादेर्मेदासस्यद्धिभेदवत् ॥१८६॥ प्रतिग्रहादिषु प्रायः सादरानादरत्वतः । दानकाले विधौ भेदः फलभेदस्य कारकः ॥१८॥ तपःस्वाध्यायवृद्धयादेदेयभेदोऽपि हेतुतः' । एक हि साम्यकृद्देयं ततो वैषम्यकृत्परम् ॥१८॥ नहीं रखना स्मृत्यनुपस्थान है ।।१८०।। बिना देखी हुई जमीनमें मलोत्सर्ग करना, बिना देखे किसी वस्तुको उठाना, बिना देखी हुई भूमिमें बिस्तर आदि बिछाना, चित्तकी एकाग्रता नहीं रखना और व्रतके प्रति आदर नहीं रखना ये पाँच प्रोषधोपवास व्रतके अतिचार हैं ॥१८१|| सचित्ताहार, सचित्त सम्बन्धाहार, सचित्त सन्मिश्राहार, अभिषवाहार और दुष्पक्वाहार ये पाँच उपभोगपरिभोगपरिमाण व्रतके अतिचार हैं। सचित्त-हरी वनस्पति आदिका आहार करना सचित्ताहार है। सचित्तसे सम्बन्ध रखनेवाले आहार-पानको ग्रहण करना सचित्त सम्बन्धाहार है । सचित्तसे मिली हुई अचित्त वस्तुका सेवन करना सचित्तसन्मिश्राहार है। गरिष्ठ पदार्थों का सेवन करना अभिषवाहार है और अधपके अथवा अधिक पके आहारका ग्रहण करना दुष्पक्वाहार है ।।१८२।। सचित्त-निक्षेप, सचित्तावरण, पर-व्यपदेश, मात्सर्य और कालातिक्रमता ये पाँच अतिथिसंविभाग व्रतके अतिचार हैं । हरे पत्ते आदिपर रखकर आहार देना सचित्तनिक्षेप है। हरे पत्ते आदिसे ढका हुआ आहार देना सचित्तावरण है। अन्य दाताके द्वारा देय वस्तुका देना परव्यपदेश है। अन्य दाताओंके गुणको नहीं सहन करना मात्सर्य है और समय उल्लंघन कर देना कालातिक्रम है ।।१८३।। जीविताशंसा, मरणाशंसा, निदान, सुखानुबन्ध और मित्रानुराग ये पाँच सल्लेखनाके अतिचार हैं। क्षपकका दीनचित्त होकर अधिक समय तक जीवित रहनेकी आकांक्षा रखना जीविताशंसा है। पीड़ासे घबड़ाकर जल्दी मरनेकी इच्छा करना मरणाशंसा है। आगामी भोगोंकी आकांक्षा करना निदान है। पहले भोगे हुए सुखका स्मरण रखना सुखानुबन्ध है और मित्रोंसे प्रेम रखना मित्रानुराग है ।।१८४।। सम्यग्ज्ञानादि गुणोंकी वृद्धि आदि स्व-परके उपकारकी इच्छासे योग्य पात्रके लिए प्रासुक द्रव्यका देना त्याग कहलाता है, इसका दूसरा नाम अतिसगं भी है ।।१८५।। जिस प्रकार भूमि आदिके भेदसे धान्यकी उत्पत्ति आदिमें भेद होता है उसी प्रकार विधि द्रव्य दाता और पात्रकी विशेषतासे दानके फलमें भेद होता है ॥१८६|| दानके पडगाहने आदिकी क्रियाओंमें आदर या अनादरके होनेसे दानकी विधिमें भेद हो जाता है और वह फलके भेदका करनेवाला हो जाता हैं ।।१८७|| तप तथा स्वाध्यायकी वृद्धि आदिका कारण होनेसे देयमें भेद होता है । यथार्थमें एक पदार्थ तो ऐसा है जो लेनेवालेके लिए समताभावका करनेवाला होता है और दूसरा पदार्थ ऐसा है जो विषमताका करनेवाला होता है। इसलिए १. योगदुष्प्रणिधानानादरस्मत्यनुपस्थानानि ॥ ३३॥ २. अप्रवेक्ष्य ख.। ३. अप्रत्यवेक्षिताप्रमाजितोत्सर्गादानसंस्तरोपक्रमणानादरस्मत्यनुपस्थानानि ॥३४॥ ४. सचित्तसम्बन्धसम्मिश्राभिषवदुष्पवाहराः ॥३५॥ ५. सचित्तनिक्षेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकालातिक्रमाः ।।३६॥ ६. अन्यदातृदेयार्पणं परव्यपदेशः ( का. टि.) ७. जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुबन्धनिदानानि ॥३७॥ ८. निसर्गाख्यः म.। ९. अनुग्रहार्थ स्वस्यातिसर्गो दानम् ॥३८॥ १०, विधिद्रव्यदातपात्र विशेषात्तद्विशेषः ॥३९।। ११. हेतुता म., ङ. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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