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________________ ६७२ हरिवंशपुराणे 'नारकस्यायुषो योगो बबारम्भपरिग्रहैः । तैर्यग्योनस्य माया तु हेतुरास्रवणस्य सः ॥१०॥ *मानुषस्यायुषो हेतुरल्पारम्मपरिग्रहः । संतुष्टत्वावतत्वादि मार्दवं च स्वभावतः ॥१०९॥ सम्यक्त्वं च व्रतित्वं च बालतापस्ययोगिता । अकामनिर्जरा चास्य देवस्यानवहेतवः ॥१०॥ 'स्वयोगवक्रता चान्यविसंवादनयोगिता । हेतुर्नाम्नोऽशुभस्यैव शुमस्यातिसुयोगता ॥११॥ तथा जामविशेषस्य तीर्थकृत्त्वस्य हेतवः । सदर्शनविशुद्धघाद्याः षोडशातिविनिर्मलाः ॥१२॥ "सद्गुणाच्छादनं निन्दा परेषां स्वस्य शंसनम् । असद्गुणसमाख्यानं नीचैर्गोत्रास्त्रवावहाः ॥११३॥ सनीचैर्वृत्त्यनुत्सेको हेतुरुक्तविपर्ययः । उच्चैर्गोत्रेऽन्तरायस्य" दानविघ्नादिकर्तृता ॥११४॥ शुभः पुण्यस्य सामान्यादारूवः प्रतिपादितः । तद्विशेषप्रतीत्यर्थमिदं तु प्रतिपद्यते ॥११५॥ "हिंसानृतवचश्चौर्याब्रह्मचर्यपरिग्रहात् । विरतिशतोऽणु स्यात्सर्वतस्तु महद्वतम् ॥११६॥ "महाणवतयुक्तानां स्थिरीकरणहेतवः । व्रतानामिह पञ्चानां प्रत्येकं पञ्च भावनाः ॥११७॥ १५ बहुत आरम्भ और बहुत परिग्रह रखना नरकायुका आस्रव है। मायाचार तिथंच आयुका आस्रव है ॥१०८।। थोड़ा आरम्भ और थोड़ा परिग्रह रखनेसे मनुष्य आयुका आस्रव होता है। सन्तोष धारण करते हुए अव्रत अवस्था होना तथा स्वभावसे कोमल परिणामी होना भी मनुष्यायके आस्रव हैं ॥१०९|| सम्यग्दर्शन, व्रतीपना, बालतप तथा अकामनिर्जरा ये देवायके आस्रव हैं ॥११॥ ___अपने योगोंकी कुटिलता और दूसरोंके साथ विसंवाद ये अशुभ नामकर्मके आस्रव हैं और अपने योगोंकी सरलता तथा विसंवादका अभाव होना शुभ नामका आस्रव है ॥११॥ नामकर्मका विशेष भेद जो तीर्थंकर प्रकृति है उसके आस्रव, अत्यन्त निर्मलताको प्राप्त दर्शनविशुद्धि आदि सोलह भावनाएँ हैं ।।११२॥ दूसरोंके विद्यमान गुणोंको छिपाना, अपनी प्रशंसा करना तथा अपने अविद्यमान गुणोंका कथन करना ये नीचगोत्रकर्मके आस्रव हैं ॥११३|| विनयपूर्ण प्रवृत्ति करना तथा अहंकार नहीं करना उच्चगोत्रके आस्रव हैं और दान आदिमें विघ्न करना अन्तरायकर्मके आस्रव हैं ।।११४।। पुण्यकर्मका जो शुभास्रव होता है उसका सामान्यरूपसे वर्णन ऊपर किया जा चुका है। अब उसकी विशेष प्रतीतिके लिए यह प्रतिपादन किया जा रहा है ॥११५॥ हिंसा, झठ, चोरी, कुशील और अपरिग्रह इन पांच पापोंसे विरक्त होना सो व्रत है। वह व्रत अणुव्रत और महाव्रतके भेदसे दो प्रकारका है। उक्त पापोंसे एकदेश विरत होना अणुव्रत है और सर्वदेश विरत होना महाव्रत है ।।११६।। महाव्रत और अणुव्रतसे युक्त मनुष्योंको अपने व्रतमें स्थिर रखनेके लिए उक्त पांचों व्रतोंमें प्रत्येककी पाँच-पांच भावनाएं कही जाती हैं ॥११७।। १, बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुषः ॥१५॥ २. माया तैर्यग्योनस्य ॥१६॥ ३. अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य ॥१७॥ ४. निश्शीलवतित्वं च सर्वेषाम् ।।१९।। ५. स्वभावमार्दवं च ॥१८॥ ६ सम्यक्त्वं च ॥२१॥ ७. सरागसयमसंयमासंयमकामनिर्जराबालतपांसि देवस्य ॥२०॥ ८. योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्नः ॥२२॥ ९. तद्विपरीतं शुभस्य ॥२३॥ १०. दर्शनविशुद्धिविनयसम्पन्नता शीलवतेष्वनतीचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी साधुसमाधियावत्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीथकरत्वस्य ॥२४॥ त. सू. अ. ६ । ११. परात्मनिन्दाप्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने च नीचैर्गोत्रस्य ।।२५।। १२. तद्विपर्ययो नीचैवत्त्यनुत्सेको चोत्तरस्य ॥२६॥ १३. विघ्नकरणमन्तरायस्य ॥२७॥ त. सू. अ. ६ । १४. हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिव्रतम् ॥१॥ देशसर्वतोऽणुमहती ॥२।। त. सु. अ. ७ । १५. तत्स्थै र्यार्थ भावनाः पञ्च पञ्च ॥३॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org |
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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