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________________ अष्टपञ्चाशः सर्गः ६६९ 'मन्दमध्यातितीवत्वात्परिणामस्य देहिनाम् । मन्दो मध्योऽतितीवः स्यादान हेतुभेदतः ॥८३॥ जीवाधिकरणश्चाप्यजीवाधिकरणोऽपि सः । आस्रवो भिद्यते द्वेधा जीवाधिकरणास्रवाः ॥८४॥ तैः संरम्भसमारम्भैः सारम्भस्त्रिकृतादिमिः । त्रियोगैश्च कषायैश्च षट्त्रिंशत्पृथगास्रवाः ॥८५॥ “निर्वर्तना च निक्षेपोऽजीवाधिकरणास्रवाः । संयोगश्च निसर्गश्च द्विचतुद्वित्रिभेदिनः ॥४६॥ निर्वतंनाधिकरणं मुलोत्तरगुणा द्विधा । शरीरवाइमनःप्राणापानादीनां च तो गुणौ ।।८७॥ सहसादुःप्रमृष्टानामोगसाप्रत्यवेक्षितैः । भेदैश्चतुर्विधैस्तन्निक्षेपाधिकरणं पुनः ॥४८॥ जीवोंके परिणाम मन्द, मध्य और तीव्र होते हैं इसलिए हेतुमें भेद होनेसे आस्रव भी मन्द, मध्यम और तीव्र होता है ।।८३।। जीवाधिकरण और अजीवाधिकरणके भेदसे आस्रवके दो भेद हैं। जीवाधिकरण आस्रवके मूलमें तीन भेद हैं-१ संरम्भ, २ समारभ्भ और ३ आरम्भ । इनमें से प्रत्येकके कृत, कारित, अनुमोदना-तीन, मनोयोग, वचनयोग, काययोग तीन और क्रोध, मान, माया, लोभरूप कषाय-चार इनसे परस्पर गणित होनेपर छत्तीस-छत्तीस भेद होते हैं। तीनोंके मिलाकर एक सौ आठ भेद हो जाते हैं। भावार्थ---किसी कार्यके करने का मनमें विचार करना संरम्भ है। उसके साधन जुटाना समारम्भ है और कार्यरूपमें परिणत करना आरम्भ है। स्वयं कार्य करना कृत है, दूसरेसे कराना कारित है और कोई करे उसमें हर्ष मानना अनुमति है। मनसे किसी कार्यका विचार करना मनोयोग है, वचनसे प्रकट हरना वचनयोग है और कायसे कार्य करना काययोग है। क्रोध कषायसे प्रेरित हो किसी कार्यको करना क्रोध कषाय है, मानसे प्रेरित हो करना मान कषाय है, मायासे प्रेरित हो करना माया कषाय है और लोभसे प्रेरित होकर करना लोभ कषाय है। मूलमें संरम्भ आदिके भेदसे आस्रव तीन प्रकारका होता है, इनमें से प्रत्येकका भेद कृत, कारित अनुमोदनाको अपेक्षा तीन प्रकारका होता है, फिर यही तीन भेद तीन योगके निमित्तसे होते हैं, इसलिए तीनका तीनमें गुणा करनेपर नो भेद होते हैं। तदनन्तर यही नौ भेद क्रोधादि कषायकी अपेक्षा चार-चार प्रकारके होते हैं इसलिए नौमें चारका गुणा करनेपर छत्तीस भेद होते हैं। छत्तीस भेद संरम्भके, छत्तीस समारम्भके और छत्तीस आरम्भके, तीनोंको मिलाकर एक सौ आठ भेद होते हैं। अथवा दूसरी तरहसे संरम्भादि तीनमें कत. कारितादिका गणा करनेपर नौ भेद हए, उनमें तीन योगका गणा करनेपर सत्ताईस हुए और उसमें क्रोधादि चार कषायका गुणा करनेपर एक सौ आठ भेद होते हैं। ये सब परिणाम जीवकृत हैं अतः इन्हें जीवाधिकरण आस्रव कहते हैं ।।८४-८५।। दो प्रकारको निर्वतंना, चार प्रकारका निक्षेप, दो प्रकारका संयोग और तीन प्रकारका निसर्ग ये अजीवाधिकरण आस्रवके भेद हैं ।।८६|| मूलगुण निर्वर्तना और उत्तरगुण निर्वर्तनाके भेदसे निवर्तनाके दो भेद हैं। शरीर, वचन, मन तथा श्वासोच्छ्वास आदिको रचना होना मूलगुण निर्वर्तना है और काष्ठ, पाषाण, मिट्टी आदिसे चित्राम आदिका बनाना उत्तरगुण निवर्तना है ।।८७॥ सहसा निक्षेपाधिकरण, दुष्प्रमृष्ट निक्षेपाधिकरण, अनाभोग निक्षेपाधिकरण और अप्रत्यवेक्षित निक्षेपाधिकरण इन चार भेदोंसे निक्षेपाधिकरण चार प्रकारका होता है । शीघ्रतासे किसी वस्तुको रख देना सहसा निक्षेप है। दुष्टतापूर्वक साफ की हुई भूमि में किसी वस्तुको रखना दुष्प्रमृष्ट निक्षेप है। १. तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्यविशेषेभ्यस्तद्विशेषः।। ६॥ त.सू.अ.६। २. अधिकरणं जीवाजीवाः ॥७॥ त. सू. अ. ६ । ३. आद्यं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारितानुमतकषायविशेषैस्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चकशः ॥८॥ त. सू. अ. ६। ४. निर्वर्तनानिक्षेपसंयोगनिसर्गा द्विचतुर्वित्रिभेदाः ।।९।। त. सू. अ. ६ । ५. परम् सांप्रत्यवेदितो म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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