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________________ ६६५ अष्टपञ्चाशः सर्गः 'शब्दभेदेऽर्थभेदार्थी व्यक्तपर्यायशब्दकः । नयः सममिरूढोऽर्थो नानासममिरोहणात् ॥४८॥ पदके व्यभिचारको नहीं चाहता अर्थात् लिंग संख्या आदिके भेदसे होनेवाले दोषको वह सदा दूर करता है। वह व्याकरणशास्त्रके आधीन रहता है। भावार्थ-जैसे लिंगव्यभिचार-'पुष्यस्तारका नक्षत्रम्' यहाँ पुंलिंग पुष्यका, स्त्रीलिंग तारका अथवा नपुंसक लिंग नक्षत्रके साथ सम्बन्ध हो जाता है, लिंगभेद होनेपर भी विशेषण-विशेष्यभावमें अन्तर नहीं आता। साधनव्यभिचारसाधन कारकको कहते हैं, इसका उदाहरण 'सेना पर्वतमधिवसति' है। यहाँ पर्वत शब्द अधिकरणकारक है अतः उसमें सामान्य नियमके अनुसार सप्तमी विभक्ति आना चाहिए तथापि अधि उपसर्गपूर्वक वस् धातुका प्रयोग होनेसे कर्मकारकमें आनेवाली द्वितीया विभक्ति हो गयी फिर भी अर्थ अधिकरणकारकके अनुसार ही- 'सेना पर्वतपर रहती है' होता है। संख्याव्यभिचार--- संख्या वचनको कहते हैं, इसके उदाहरण हैं 'जलमापो, वर्षाः ऋतुः, आम्राः वनम्, वरणाः नगरम्' यहाँपर 'जलम्' एकवचन है फिर भी उसका पर्याय 'आपः' यह नित्य बहुवचनान्त शब्द दिया जा सकता है। 'वर्षाः' बहुवचन है और 'ऋतुः' एकवचन है फिर भी इनका विशेष्यविशेषण भाव हो सकता है। इसी प्रकार शेष उदाहरण भी समझ लेना चाहिए। कालव्यभिचार-भूत, भविष्यत् और वर्तमानके भेदसे कालके तीन भेद हैं इनमें परस्पर विरुद्ध कालोंका भी प्रयोग होता है, जैसे 'विश्वदृश्वास्य पुत्रो जनिता' यह उदाहरण है। यहाँ विश्वदृश्वाका अर्थ होता है 'विश्वं दृष्टवान्' इति विश्वदृश्वा-जिसने विश्वको देख लिया। परन्तु यहांपर विश्वदृश्वा इस भूतकालिक कर्मका जनिता इस भविष्यत्कालिक क्रियाके साथ सम्बन्ध जोड़ा गया है। उपग्रहव्यभिचार-आत्मनेपद, परस्मैपद आदि पदोंको उपग्रह कहते हैं। शब्दनय परस्मैपदके स्थानपर आत्मनेपद और आत्मनेपदके स्थानपर परस्मैपदके प्रयोगको जो कि व्याकरणके अनुसार होता है स्वीकृत कर लेता है। जैसे तिष्ठति, संतिष्ठते, प्रतिष्ठते, रमते, विरमति, उपरमति आदि । यहाँ 'तिष्ठति में परस्मैपदका प्रयोग होता है परन्तु सम् और प्र उपसर्ग लग जानेसे संतिष्ठते तथा प्रतिष्ठतेमें आत्मनेपद हो गया। 'रमते' यह आत्मनेपदका प्रयोग है परन्तु 'विरमति में वि उपसर्ग और 'उपरमति'में उप उपसर्ग लग जानेसे परस्मैपद प्रयोग हो जाता है। लिंगादिके व्यभिचारके समान शब्दनय पुरुष व्यभिचारको भी नहीं मानता जैसे 'एहि मन्ये रथेन यास्यति, नहि यास्यति, यातस्ते पिता'-यहाँपर 'मन्यसे' इस मध्यमपुरुषके बदले हास्यमें 'मन्ये' इस उत्तमपुरुषका प्रयोग किया गया है। तात्पर्य यह है कि शब्दनय व्याकरणके नियमोंके आधीन है, अतः वह सामान्य नियमोंके विरुद्ध प्रयोग होनेसे आनेवाले दोषको स्वीकृत नहीं करेगा ||४७|| जो शब्दभेद होनेपर अर्थभेद स्वीकृत करता है अर्थात् एक पदार्थके लिए अनेक पर्यायात्मक शब्द प्रयुक्त होनेपर उनके पृथक्-पृथक् अर्थको स्वीकृत करता है वह समभिरूढ़नय है, जैसे लोकमें देवेन्द्रके लिए इन्द्र, शक्र और पुरन्दर शब्दका प्रयोग आता है परन्तु समभिरूढ़नय इन सबके पृथक्-पृथक् अर्थको ग्रहण करता है। वह कहता है कि जो परम ऐश्वर्यका अनुभव करता है वह इन्द्र है, जो शक्तिसम्पन्न है वह शक है और जो पुरोंका विभाग करनेवाला है वह पुरन्दर है, इसलिए इन भिन्न-भिन्न पर्याय शब्दोंसे सामान्य देवेन्द्रका ग्रहण न कर उसकी भिन्नभिन्न विशेषताओंका ग्रहण करता है। अथवा जो नाना अर्थोंका उल्लंघन कर एक अर्थको १. 'नानार्थसमभिरोहणात समभिरूढः' अथवा 'अर्थगत्यर्थः शब्दप्रयोगः' अथवा 'यो यत्राभिरूढः स तत्र समेत्याभिमुख्येनारोहणात् समभिरूढः' । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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