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________________ सप्तपश्चाशः सर्गः ६५१ अन्तर्नाटकशाला स्यात्तत: कल्याणसप्रमाः । लोकपालविलासिन्यो यत्र नृस्यन्ति सन्ततम् ॥६८॥ तदन्तरे भवत्यन्यत्पीठं पीठगुणास्पदम् । प्रोदंशुरत्नजालास्ततिमिरावलिमण्डलम् ॥६९॥ सिद्धार्थपादपाः सन्ति सिद्धरूपविराजितैः । विटपैाप्य दिक्प्रान्तमिच्छयेव स्थितास्ततः ॥७॥ स्तूपा द्वादशभूभूषा भूषयन्त्यथ मन्दिरम् । हिरण्मया महामेरुं चत्वारो मेरवो यथा ॥७॥ चतुर्दिग्गोपुरद्वारवेदिकालंकृताः शुभाः । चतस्रो दिवथ ज्ञेयाश्चतसृष्वपि वापिकाः ॥७२॥ नन्दाभद्राजयापूर्णेत्यभिख्यामिः क्रमोदिताः । यजलाभ्युक्षिताः पूर्वा जाति जानन्ति जन्तवः ॥७३॥ ताः पवित्रजलापूर्णसर्वपापरुजाहराः । परापरमवाः सप्त दृश्यन्ते यासु पश्यताम् ॥७॥ अथ गव्यूतमुद्विद्धं योजनाधिकविस्तृतम् । कटोमावरण्डस्थकदलीध्वजसंकुलम् ॥७५॥ निरन्तरविशन्निर्यजनद्वारोच्चतोरणम् । त्रिलोकविजयाधानमहो भाति जयाजिरम् ॥७६॥ मुक्ताबालुकविस्तीर्णप्रवालसिकतान्तरम् । सुरत्नकुसुमैश्चित्रं हेमाम्भोजैस्तदर्चितैः ॥७॥ तपनीयरसालिप्तस्तपनैरिव भूगतैः । तत्र तत्र यथादेश्यं मण्ड्यन्ते पृथुमण्डलैः ॥७॥ प्रासादैमण्डपैश्चान्यैः सुखावासैः सुशोभते । देवासुरनरापूर्णस्तत्र तत्र विचित्रितम् ॥७९॥ क्वचिदालेख्य हृद्यानि वेश्मानि क्वचिदन्तरे । पुराणाद्भुतमतीनि चित्राख्यानान्वितानि च ॥८॥ कचित्पुण्यफलप्राप्त्या पापपाकेन च क्वचित् । धर्माधर्मगतिं साक्षादर्शयन्तीव पश्यतः ॥८॥ के वक्ष प्रकाशमान हो रहे हैं॥६७॥ तदनन्तर उन्हीं के भीतर नाटकशाला है जिसमें सवर्णके समान कान्तिकी धारक लोकपाल देवोंको देवांगनाएं निरन्तर नृत्य करती रहती हैं ॥६८॥ उनके मध्यमें श्रेष्ठ गुणोंका स्थान तथा ऊंची उठनेवाली किरणोंसे सुशोभित रत्नावलीसे अन्धकारके समूहको नष्ट करनेवाला दूसरा पीठ है ।।६९।। उसके आगे सिद्धार्थवृक्ष हैं जो सिद्धोंकी प्रतिमाओंसे सुशोभित शाखाओंसे इच्छापूर्वक ही मानो दिशाओंको व्याप्त कर स्थित हैं ॥७०॥ उसके आगे एक मन्दिर है जिसे पृथ्वीके आभरणस्वरूप बारह स्तूप उस तरह सुशोभित करते रहते हैं जिस तरह कि सुवर्णमय चार मेरु पर्वत जम्बूद्वीपके महामेरुको सुशोभित करते रहते हैं ॥७१।। इनके आगे चारों दिशाओंमें शुभ वापिकाएं हैं जो चारों दिशाओंमें बने हुए गोपुर-द्वारों और वेदिकासे अलंकृत हैं ॥७२॥ नन्दा, भद्रा, जया और पूर्णा ये चार उनके नाम हैं। उन वापिकाओंके जलमें स्नान करनेवाले जीव अपना पूर्व-भव जान जाते हैं ।।७।। वे वापिकाएं पवित्र जलसे भरी एवं समस्त पापरूपी रोगोंको हरनेवाली हैं। इनमें देखनेवाले जीवोंको अपने आगे-पीछेके सात भव दिखने लगते हैं ॥७४।। वापिकाओंके आगे एक जयांगण सुशोभित है जो एक कोश ऊंचा है, एक योजनसे कुछ अधिक चौड़ा है, कटि बराबर ऊंचे बरण्डोंपर स्थित कदली-ध्वजाओंसे व्याप्त है, जिनमें मनुष्य निरन्तर प्रवेश करते और निकलते रहते हैं ऐसे द्वारों और उच्च तोरणोंसे युक्त है, तीन लोकको विजयका आधार है, उसमें बीच-बीचमें मूंगाओंकी लाल-लाल बालूका अन्तर देकर मोतियोंकी सफेद बालू बिछी हुई है, उत्तम रत्नमय पुष्पों और रखे हुए सुवर्णकमलोंसे चित्र-विचित्र है। उस जयांगणके भूभाग, जहाँ-तहाँ सुवर्ण रससे लिप्त अतएव पृथिवीपर आये हुए सूर्योंके समान दिखनेवाले विशाल वर्तुलाकार मण्डलोंसे सुशोभित हैं। जहां-तहाँ नाना प्रकारके चित्रों को त्रित वह जयांगण, देव, असुर और मनुष्योंसे परिपूर्ण भवनों, मण्डपों तथा अन्य सुखक : । सस्थानोंसे सुशोभित है ।।७५-७९।। कहीं चित्रोंसे सुन्दर और कहीं पुराणोंमें प्रतिपादित आश्चर्यकारी विभूतिसे युक्त तथा नाना प्रकारके कथानकोंसे सहित भवन बने हैं ॥८०॥ वे भवन कहीं पुण्यके फलकी प्राप्तिसे देखनेवाले लोगोंको धर्मका साक्षात् फल १. भूभागा क.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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