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________________ ६४९ सप्तपञ्चाशः सर्गः तासु भक्त्या प्रनृत्यन्ति द्वात्रिंशज्ज्योतिषां स्त्रियः । हावमावविलासाळ्या रसपुष्टिसपुष्टयः ॥४०॥ सचतुर्गोपुरातोऽपि पर्येति वनवेदिका । दिव्या वज्रमयी वीथीपार्श्वयोर्ध्वजपतयः ॥४१॥ त्रिदण्डविस्तृताश्चित्राः पीठिकाः प्रतिभक्तिगाः । योजना|च्छुितास्तासु वंशा रस्नात्मपूर्वकाः ॥४२॥ सदग्रपालिकानवफलकाधिष्ठिता ध्वजाः । महान्तो दश चिम्राः सस्किङ्किणीचित्रपट्टकाः ॥४॥ शिखिहंसगरुत्मत्वकसिंहममकराम्बुजैः । वषरूपेण चक्रेण समधिष्ठितमूर्तयः ॥४॥ तेषामष्टशतं जातिविशश्च चतु:शती । ध्वजसंख्या मवेदेषां सामान्येन समासतः ॥४५॥ सद्वात्रिंशत्सहस्राः स्युर्लक्षाः पञ्चाशदष्ट च । साधिका ध्वजसंख्येयं सैकदिक्का द्विसंगुणा ॥४६॥ षट्पञ्चाशत्सहस्राणि लक्षा षट्षष्टिरष्टसु । ध्वजकोट्यश्वतस्रः स्युश्चतुर्दिक्ष्वपि साधिकाः ॥४७॥ प्रीतिकल्याणमध्ये स्युरमितः पञ्चभूमिकाः । नृत्तशालाः प्रनृत्यन्ति यत्र भावनयोषितः ॥४८॥ प्राकारोऽन्तः परोयाय द्वितीयो हेमनिर्मितः । पञ्चभूमिकरत्नश्रीचतुर्गोपुरभूषितः ॥४९॥ हटवाटकपीठस्थाः कम्बुकण्ठगुणोज्ज्यलाः । शातकुम्ममयाः कुम्माः साम्भोजास्याः सहाम्भसः ॥५०॥ शोमन्ते तद्विपावषु द्वौ द्वौ मङ्गलदर्शनाः । वेत्रदण्डधरा द्वास्थास्तवाःसु भवनाधिपाः ॥५१॥ पुरस्ताद्गोपुराणाचनाटकवेश्मनी । पुरस्तात्त ततो हैमौ द्वौ द्वौ धूपघटौ स्फुटौ ॥५२॥ चतुर्दिसिद्धरूपाढयं द्विह्निः सिद्धार्थपादपम् । कल्पवृक्षवनं तत्र वीथ्यन्तेषु यथायथम् ॥५३॥ नाना प्रकारके बेलबटोंसे सुशोभित हैं और उनकी भमियां रत्नोंकी बनी हैं तथा उनकी दोवालें स्वच्छ स्फटिकसे निर्मित हैं ॥३९॥ उनमें ज्योतिषी देवोंकी बत्तीस-बत्तीस देवांगनाएँ नृत्य करती हैं जो हाव, भाव और विलाससे युक्त तथा शृंगार आदि रसोंकी पुष्टिसे सुपुष्ट होती हैं ॥४०॥ उसके आगे चार गोपुरोंसे युक्त अत्यन्त सुन्दर वज्रमयी वनवेदी है जो पूर्वोक्त वनोंको चारों ओरसे घेरे हुए है। चार गोपुरोंके आगे चार वीथियाँ हैं और उनके दोनों पसवाड़ोंमें ध्वजाओंकी पंक्तियां फहराती रहती हैं ॥४१॥ प्रत्येक विभागमें उन ध्वजाओंकी पृथक्-पृथक् पीठिकाएं हैं जो तीन धनुष चौड़ी हैं, चित्र-विचित्र हैं तथा उनपर आधा योजन ऊंचे रत्नमयी बांस लगे हुए हैं ॥४२॥ उन बांसोंके अग्रभागपर जो पटिया लगे हैं उनमें दश प्रकारकी रंग-बिरंगो, छोटी-छोटी घण्टियों और चित्रपट्टकोंसे युक्त बड़ो ध्वजाएं फहराती रहती हैं ॥४३।। वे दस प्रकारको ध्वजाएँ क्रमसे मयूर, हंस, गरुड़, माला, सिंह, हाथी, मकर, कमल, बैल और चक्रके चिह्नसे चिह्नित होती हैं ॥४४॥ एक दिशामें एक जातिकी ध्वजाएँ एक सौ आठ होती हैं और चारों दिशाओंकी मिलकर एक जातिको चार सौ बत्तीस होती हैं। यह इनकी सामान्य रूपसे संक्षेपमें संख्या बतलायी है ॥४५॥ विशेष रीतिसे एक दिशामें एक करोड़ सोलह लाख चौंसठ हजार हैं और चारों दिशाओंमें चार करोड़ अड़सठ लाख छत्तीस हजार कुछ अधिक हैं ॥४६-४७॥ प्रीति और कल्याणरूप फल देनेवाली वापिकाओंके बीचके मार्गमें दोनों ओर पांच खण्डकी नृत्यशालाएँ हैं जिनमें भवनवासी देवोंकी देवांगनाएँ नृत्य करती हैं ॥४८॥ नृत्यशालाओंके आगे पांच-पांच खण्डके रत्नमयी चार गोपुरोंसे विभूषित स्वर्णनिर्मित दूसरा कोट है ॥४९॥ गोपुरोंके दोनों पसवाड़ोंमें देदीप्यमान सुवर्णके पीठोंपर स्थित, शंखके समान सुन्दर कण्ठोंमें पड़ी मालाओंसे सुशोभित मुखोंपर कमल धारण करनेवाले एवं जलसे भरे स्वर्णनिर्मित मंगलकलश दोदोकी संख्या में सुशोभित हैं। इस दूसरे कोटके द्वारोंपर भवनवासी देवोंके इन्द्र द्वारपाल हैं जो बेंतकी छड़ी धारण किये हुए पहरा देते हैं ॥५०-५१॥ गोपुरोंके आगे दो-दो नाट्यशालाएं हैं और उनके आगे स्वर्णनिर्मित दो-दो धूपघट रखे हुए हैं ॥५२॥ उससे आगे चारों दिशाओंमें सिद्धों १. विलासाद्या म.। २. वनदेविका म.। ३. वृत्त शाला: म. । ८२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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