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________________ सप्तपश्चाशः सर्गः समवादि समापादि शरणं शरणं क्षणात् । त्रिजगत्प्राणिनां देवः पाकशासनशासनात् ॥१॥ सर्वो द्वारवतीलोको यदुभोजकुलाम्बुधिः । आरुरोह निरिं भूत्या रामकेशवपूर्वकः ॥३॥ अवलोक्य जिनेन्द्रस्य शरण समवाकिम् । बहिरन्तःपरं प्रारद्विस्मयं जनसागरः ॥३॥ यादृशी समवस्थानभूमिस्तीर्थकतामिह । तादृशी श्रोतृलोकस्य समासेन निगद्यते ॥४॥ भूमेः स्वभावभूताया दिव्यारस्निप्रमोच्छितिः । भूमिस्तावत्समुच्छाया कल्पभूमिरुपर्यतः ॥५॥ स्वर्गश्रियं श्रिया जेत्री चतुरस्रा सुखप्रदा । सैकानद्वादशाद्यात्मयोजनां कालदेशतः ॥६॥ उच्चैर्गन्धकुटीदेशकर्णिका पद्ममूर्तिवत्' । माति भूमिरसो बाह्य भूश्रीपत्रपरम्परा ॥७॥ इन्द्रनीलमयी भूमिर्बाह्यादर्शतलोपमा । भूयसामपि भूयस्त्वं विशतां विदधाति या ॥६॥ दूरादिन्द्रादयो यस्यां मानयन्ति नमस्यया । मानार्हास्त्रिजगन्नाथं साभूर्मानाङ्गणामिधा ॥९॥ महादिक्षु चतस्रोऽस्या गव्यूतिद्वयविस्तृताः। वीथ्यस्तन्मध्यगानीयुर्मानपीठान्पुरः प्रमान् ॥१०॥ स्वोत्सेधत्रिगुणात्मीयविस्तराण्युक्तिविस्तरैः । सौवर्णरत्नमूर्तीनि मान्यन्ते नृसुरासुरैः ॥११॥ नृसुरामानवस्तम्भानास्थायार्चन्ति यत्र भूः । सा त्वास्थानाङ्गणाभिख्या ज्वलल्लौहितरत्नभा ॥१२॥ मध्ये वीथि चतस्रोऽत्र त्रिभङ्गा हैमपीठिकाः । भान्त्युरोद्वयसोच्छायाः वृत्ताः क्रोशार्धविस्तृताः ॥१३॥ अथानन्तर देवोंने इन्द्रकी आज्ञासे क्षण-भर में तीन जगतके जीवोंके लिए शरणभत समवशरणकी रचना कर दी ॥१॥ बलदेव और कृष्णको आदि ले यादव और भोजवंशके सागरस्वरूप समस्त द्वारिका निवासी बड़े वैभवके साथ गिरिनार पर्वतपर चढ़े और भीतर-बाहर जिनेन्द्र भगवानका समवशरण देखकर वह जनताका अपार सागर परम आश्चर्यको प्राप्त हुआ ॥२-३।। तीर्थंकरोंकी समवसरण भूमि जैसी होती है उसका यहाँ संक्षेपसे श्रोताओंके लिए वर्णन किया जाता है ॥४॥ समवसरणको दिव्य भूमि स्वाभाविक भूमिसे एक हाथ ऊंची रहती है और उससे एक हाथ ऊपर कल्पभूमि होती है ||५|| यह भूमि अपनी शोभासे स्वर्गलक्ष्मीको जीतनेवाली. चौकोर, सुखदायी और देशकालके अनुसार बारह योजनसे लेकर एक योजन तक विस्तारवाली होती है। भावार्थ-समवसरण भूमिका उत्कृष्ट विस्तार बारह योजन और कमसे-कम विस्तार एक योजन प्रमाण होता है ।।६।। यह भूमि कमलके आकारको होती है इसमें गन्धकुटो तो कणिकाके समान ऊँची उठी होती है और बाह्य भूमि कमलदलके समान विस्तृत है ।।७।। यह इन्द्रनीलमणिसे निर्मित होती है, इसका बाह्य भाग दर्पणतलके समान निर्मल होता है और प्रवेश करनेवाले बहुतसे जीवोंको एक साथ स्थान देनेवाली रहती है |८|| जिसमें मानके योग्य इन्द्र आदि देव त्रिलोकीनाथ-भगवान्की दूरसे ही पूजा करते हैं वह मानांगण नामकी भूमि है ॥९|| इस भूमिको चारों महादिशाओंमें दो-दो कोश विस्तृत चार महावीथियाँ हैं। ये वीथियां अपने मध्य में स्थित चार मानस्तम्भोंके पीठ धारण करती हैं ॥१०॥ ये पीठ अपनी ऊंचाईसे तिगुने चौड़े एवं सुवर्ण और रत्नमयी मूर्तियोंके धारक होते हैं तथा मनुष्य, सुर, असुर सभी आकर इन्हें नमस्कार करते हैं ।।११।। जहां स्थित होकर मनुष्य और देव, मानस्तम्भोंकी पूजा करते हैं वह आस्थानांगणा नामकी भूमि देदीप्यमान लाल मणियोंको कान्तिको धारण करती है ।।१२।। वीथियोंके मध्यमें तीन कटनीदार चार सुवर्णमयी पीठिकाएँ हैं जो छाती बराबर ऊंची हैं और आधा कोश चौड़ी . १. पद्मरूपवत् क. । २. वाद्य भू म., बाह्याभू क. । ३. पुरः प्रमाः क., ख., ग., म. । ४. मध्ये वापि म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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