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________________ पञ्चपश्चाशः सर्गः Frie रणमुखेषु रणार्जितकोर्तयः करितुरङ्गरथेष्वपि निर्भयान् । अभिमुखानमिहन्तुमधिष्ठितानमिमुखाः प्रहरन्ति न हीतरान् ॥१०॥ शरभसिंहवनद्विपयूथपान् प्रकुपितान् परिहृस्य विदूरतः ।। मृगशशान् पृथुकान् प्रहरत्यमून् कथमिवान पुमान्न विलजते ॥९॥ चरणकण्टकवेधभयागटा विदधते परिधानमुपानहाम् । मृदुमृगान् मृगयासु पुनः स्वयं निशितशस्त्रशतः प्रहरन्ति हि ॥९२।। विषयसौख्यफलप्रसवोदयः प्रथम एष मृगौघवधोऽधमः । अनुभवे पुनरस्य रसप्रदे षडसुकायनिपीडनमध्यधि ॥१३।। विपुलराज्यपदस्थितिमिच्छता सकलसत्त्ववधोऽभिमुखीकृतः । दुरितबन्धफलस्तु वधो ध्रुवं कटुफला स्थितिरस्य परा' यतः ॥१४॥ प्रकृतिदेशरसानुभवस्थिति प्रचितबन्धचतुष्कवशीकृतः । भजति दुर्गतिषु क्रमतो भ्रमन् विविधदुःखमयं भवभृद्गणः ।।५५।। प्रतिभवं मयदुःखखनीयुतैर्विषयजैः कुसुखैरतिभावितः । नरमवेऽप्यसुमानतिमोहितो न यतते भवदुःखनिवृत्तये ॥१६॥ भवसुखानि बहिर्विषयोद्भवान्यतिमहान्स्यपि सन्ततिमन्स्यपि । भवभूतो न भवन्ति हि तुष्टये जलनिधेरिव सिन्धुशतान्यपि ।।१७।। देखो ॥८८-८९।। रणके अग्रभागमें जिन्होंने कीर्तिका संचय किया है ऐसे शूरवीर मनुष्य हाथी, घोड़े और रथ आदिपर सवार हो निर्भयताके साथ मारनेके लिए सामने खड़े हए लोगोंपर ही उनके सामने जाकर प्रहार करते हैं अन्य लोगोंपर नहीं ।।९.०॥ जो पुरुष अत्यधिक क्रोधसे युक्त शरभ, सिंह तथा जंगली हाथियों आदिको दूरसे छोड़ देते हैं और मृग तथा खरगोश आदि क्षुद्र प्राणियोंपर प्रहार करते हैं उन्हें लज्जा क्यों नहीं आती? ॥९१।। अहा ! जो शूरवीर पैरमें कांटा न चुभ जाये इस भयसे स्वयं तो जूता पहनते हैं और शिकारके समय कोमल मृगोंको सैकड़ों प्रकारके तीक्ष्ण शस्त्रोंसे मारते हैं यह बड़े आश्चर्यकी बात है ॥९२।। यह निन्द्य मृग-रमूहका वध प्रथम तो विषयसुखरूपी फलको देता है परन्तु जब इसका अनुभाग अपना रस देने लगता है तब उत्तरोत्तर छह कायका विघात सहन करना पड़ता है। भावार्थ--हिंसक प्राणी छड़कायके जीवोंमें उत्पन्न होता है और वहाँ नाना जीवोंके द्वारा मारा जाता है ||९३।। यह मनुष्य चाहता तो यह है कि मुझे विशाल राज्यकी प्राप्ति हो पर करता है समस्त प्राणियोंका वध सो यह विरुद्ध बात है क्योंकि प्राणिवधका फल तो निश्चय ही पापबन्ध है और उसके फलस्वरूप कटुक फलको ही प्राप्ति होती है राज्यादिक मधुर फलको नहीं ॥९४।। प्रकृति, प्रदेश, स्थिति और अनुभाग रूप चार प्रकारके बन्धके वशीभूत हुआ यह प्राणियोंका समूह क्रम-क्रमसे दुर्गतियोंमें परिभ्रमण करता हुआ नाना प्रकारके दुःख भोगता रहता है ।।९५॥ यह प्राणी प्रत्येक भवमें भय और दुःखको खानसे युक्त विषय-सम्बन्धी खोटे सुखोंसे प्रभावित रहा है और आज मनुष्यभवमें भी इतना अधिक मोहित हो रहा है कि संसार-सम्बन्धी दुःखको दूर करनेके लिए यत्न ही नहीं करता ॥१६॥ जिस प्रकार सैकड़ों नदियां समुद्रके सन्तोषके लिए नहीं हैं उसी प्रकार बाह्य विषयोंसे उत्पन्न, सन्ततिबद्ध, बहुत भारी संसारसुख भी प्राणीके सन्तोषके लिए नहीं हैं ।।९७।। १. वरा म.। २. स्थितिः प्रचित म. । ३. विषमजः म.। ४. सन्ततितान्यपि म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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