SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 629
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ पशाशत्तमः सर्गः चक्रव्यूहस्तदा दक्षे रचितोऽसौ व्यराजत । स्वसाधनमनस्तोषी परसाधनमीतिकृत् ॥११॥ चक्रव्यूह विदित्वा तं वसुदेवो विनिर्मितम् । चकार गरुडव्यूह तद्भेदाय विशारदः ॥१२॥ अर्ध कोटीकुमाराणां मुखे तस्य महात्मनाम् । स्थापिता रणश राणां नानाशस्त्रास्त्रधारिणाम् ॥१३॥ बली हलधरस्तत्र शाङ्गपाणिश्च मूर्धनि । स्थितावतिरथौ वीरौ स्थैर्यान्निर्जितभूधरौ ॥११॥ अक्रूरः कुमु दो वीरः सारणो विजयो जयः । पद्मो जरत्कुमारोऽपि सुमुखोऽपि च दुर्मुखः ॥११५॥ सूनुर्मदनवेगाया दृढमुष्टिमहारथः । विदूरथोऽप्यनावृष्टिर्वसुदेवस्य 'येऽङ्गजाः ॥११६॥ रथरक्षान्वितौ रामकृष्णयोः पृष्ठरक्षिणः । रथकोट्या समेतस्तु पृष्टेभोजः प्रतिष्ठितः ॥१७॥ पृष्टरक्षानृपास्तस्य मोजस्य नृपतेस्ततः । धारणः सागरश्चान्ये रणशौण्डा व्यवस्थिताः ॥११॥ दक्षिणं पक्षमाश्रित्य सुतैः साकं महारथैः । समुद्रविजयोऽतिष्टबलेन महता वृतः ॥११९।। तत्पक्षरक्षणे दक्षाः कुमारा रिपुमारणाः । सत्यनेमिमहानेमिर्दृढनेमिः सुनेमिना ॥१२॥ नमिर्महारथश्चापि जयसेनमहीजयो। तेजःसेनो जयः सेनो नयो मेघो महाद्यतिः ॥१२॥ दशाश्चिापि विख्याताः शतशोऽन्ये च भूभृतः । रथकोटीचतुर्मागसहिताः समवस्थिताः ॥१२२॥ वामपक्षमुपाश्रित्य रामस्य तनयाः स्थिताः । पाण्डवाश्च महात्मानः पण्डिता युद्धकर्मणि ॥१२३।। उल्मुको निषधश्चापि प्रकृतिद्युतिरप्यतः । सत्यकः शत्रुदमनः श्रीध्वजो ध्रुव इत्यपि ॥१२४॥ राजा दशरथश्चापि देवानन्दोऽथ शन्तनुः । आनन्दश्च महानन्दश्चन्द्रानन्दो महाबलः ॥१२५॥ पृथुः शतधनुश्चापि विपृथुश्च यशोधनः । दृढबन्धोऽनुवीर्यश्च सर्वशस्त्रभृतांवरः ॥१२॥ बाहर भी अनेक राजा नाना प्रकारके व्यूह बनाकर स्थित थे ॥११०।। इस प्रकार चतुर राजाओंके द्वारा रचित, अपनी सेनाके मनको सन्तुष्ट करनेवाला और शत्रुकी सेनाके मनमें भय उत्पन्न करनेवाला वह चक्रव्यूह उस समय अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ॥१११॥ इधर रचना करनेमें निपुण वसुदेवको जब पता चला कि जरासन्धकी सेनामें चक्रव्यूहकी रचना की गयी है तब उसने भी चक्रव्यूहको भेदनके लिए गरुड़-व्यूहकी रचना कर डाली ॥११२॥ उदात्तचित्त, रणमें शूर-वीर तथा नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको धारण करनेवाले पचास लाख यादव कुमार उस गरुड़के मुखपर खड़े किये गये ।।११३॥ धीर-वीर एवं स्थिरतासे पर्वतको जीतनेवाले अतिरथ, पराक्रमी बलदेव और श्रीकृष्ण उसके मस्तकपर स्थित हुए ॥११४॥ अक्रूर, कुमुद, वीर, सारण, विजय, जय, पद्म, जरत्कुमार, सुमुख, दुर्मुख, मदनवेगा पुत्र महारथ दृढमुष्टि, विदूरथ और अनावृष्टि ये जो वसुदेवके पुत्र थे वे बलदेव और कृष्णके रथको रक्षा करनेके लिए उनके पृष्ठरक्षक बनाये गये। एक करोड़ रथोंसे सहित भोज, गरुड़के पृष्ठ भागपर स्थित हुआ ॥११५-११७॥ राजा भोजकी पृष्ठ-रक्षाके लिए धारण तथा सागर आदि अन्य अनेक रणवीर राजा नियुक्त हुए ॥११८।। अपने महारथी पुत्रों तथा बहुत बड़ी सेनासे युक्त राजा समुद्रविजय उस गरुड़के दाहिने पंखपर स्थित हुए ।।११९।। और उनकी आजू-बाजूकी रक्षा करनेके लिए चतुर, शत्रुओंको मारनेवाले सत्यनेमि, महानेमि, दृढ़नेमि, सुनेमि, महारथी नमि, जयसेन, महीजय, तेजसेन, जय, सेन, नय, मेघ, महाद्युति आदि दशा हं ( यादव ) तथा सैकड़ों अन्य प्रसिद्ध राजा पचीस लाख रथोंके साथ स्थित हुए ।।१२०-१२२॥ बलदेवके पुत्र और युद्ध कार्यमें निपुण महामना पाण्डव गरुड़के बायें पक्षका आश्रय ले खड़े हुए ॥१२३॥ इन्हींके समीप उल्मक, निषध, प्रकृतिद्युति, सत्यक, शत्रुदमन, श्रीध्वज, ध्रुव, राजा दशरथ, देवानन्द, शन्तनु, आनन्द, महानन्द, चन्द्रानन्द, महाबल, पृथु, शतधनु, विपृथु, यशोधन, दृढ़बन्ध और सब प्रकारके शस्त्रोंसे आकाशको १. मुख्ये म. । २. तेऽङ्गजाः म. । ३. पृष्ठभोजः म. । जयसेनो । ५. शतघनश्चापि म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy