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________________ हरिवंशपुराणे सुगतगताममूं परमकारुणिकां तपसा जगति जनस्ततः प्रभृति निरागसमत्र जडः । वनचरदर्शितेन नु पथा नरकाभिमुखः पिशितवशो निहन्ति हि पशून् महिषप्रभृतीन् ॥३४॥ न हि महिषास्रपानविधिका न हि शूलकरा न हि सरदुर्गतावपि परस्परघातकता। रचयति मित्तिमात्रमुपलभ्य कविः कवितां सदसतीं यथा च लिखति स्फुटचित्रकरः ॥३५॥ सदपि दुरीहितं रहसिजं हि परस्य परैः सदसि निगद्यमानमधमावहतीति सताम् । मतमिदमस्य तु प्रकटनं जगतामसतो न नरकपातहेतुरिति कस्य सतो वचनम् ॥३६॥ अवितथमित्यमी वितथमेव शठाः कवयः स्वपरमहारयो विदधते विकथाकथनम् । परवधकापथेषु भुवि तेषु तथेति जनः सुर-रव-मूढधीः पतति गडरिकाकटवत् ॥३७॥ क्व परदयापरः परमधर्मपथो भुवने विधिवदनुष्ठितस्तनुभृतां सुखदः प्रकटः । क्व च परघातजो नरकहेतुरधर्मकलिः कुकविविकल्पितः खलकलौ खलु धर्मतया ॥३८॥ प्रकटितलोकपालचरिताः खललोकभयात्तनुभृदनुग्रहं विदधतः परिरक्षणतः । समहिषमेषघातमधिदैवमत्र नृपाः विदधति यत्र तत्र कुजनेषु तु कैव कथा ॥३९॥ कथमपि कार्यसिद्धिमुपलभ्य हि देवघशात्प्रतिनिधिदेवताकृतमिति प्रतिपद्य नरः । निजवपुरायुधैः सुविनिकृत्य ददद्रुधिरं परतनुकतने भवति वा स कथं सघृगः ॥४०॥ ओर खून एवं मांसको बलि चढ़ाना शुरू कर दी। इस बलिदानसे वहाँ मक्खियाँ और मच्छर उतराने लगे, वह स्थान आँखोंके लिए विषके समान दिखाई पड़ने लगा। तथा फैली हुई सड़ी बाससे वहाँको दिशाएँ दुर्गन्धित हो गयों ॥३२-३३।। यद्यपि वह आर्यिका परम दयालु थी, निष्पाप थी और तपके प्रभावसे उत्तम गतिको प्राप्त हई थी तथापि इस संसारमें मांसके लोभी मूर्ख जन भीलोंके द्वारा दिखलाये हुए मार्गसे चलकर उसी समयसे भैंसा आदि पशुओंको मारने लगे ॥३४॥ उत्तम देवगतिकी बात छोड़िए निकृष्ट देवगतिमें भी कोई देव भैंसाओंका रुधिर पान करनेवाले एवं हाथोंमें त्रिशूल धारण करनेवाले नहीं हैं और न उनमें परस्पर एक दूसरेका मारना ही है फिर भी कवि स्फुट चित्रकारके समान जरा-सी भित्तिका आधार पा सत्पुरुषाको भी दूषण लगानेवाली कविता लिख डालते हैं ।।३५।। दूसरेकी एकान्तमें होनेवाली सत्य कुचेष्टाका भी सभा दूसरोंके द्वारा कहा जाना पाप बन्धका कारण है-यह सत्पुरुषोंका मत है। फिर किसीके अविद्यमान दोषको संसारके सामने प्रकट करना नरकगतिका कारण नहीं है यह किस सत्पुरुषका वचन है ? अर्थात् किसीका नहीं ॥३६।। स्व-परके महावैरी ये धूर्त कवि असत्यको सत्य है ऐसा बताकर विकथाओंका कथन करते हैं और 'ये देवताओंके वचन है' ऐसा समझ मूर्ख प्राणी पृथिवीपर, परका वध करना आदि कुमार्गों में भेड़िया-धसानके समान गिरते चले जाते हैं ॥३७|| विधिपूर्वक आराधना करनेपर प्राणियोंको सुख देनेवाला, परजीवोंको दयामें तत्पर संसारमें प्रकट हुआ परम धर्मका मार्ग कहाँ ? और दुष्ट कलिकालमें कुकवियोंके द्वारा धर्मरूपसे कल्पित, परघातसे उत्पन्न, नरकका कारण अधर्मकी कलह कहाँ ? भावार्थ-धर्म और अधर्ममें महान् अन्तर है।।३८॥ जिन्होंने लोकपालका चरित प्रकट किया है और जो दुष्टजनोंके भयसे रक्षाकर जीवोंपर सदा अनुग्रह करते हैं ऐसे राजा भी जहाँ इस संसारमें देवताओंको लक्ष्य कर भैंसा तथा मेष आदि जन्तुओंका घात करते हैं वहाँ अन्य क्षुद्र मनुष्योंको तो कथा ही क्या है ?||३९|| भाग्यवश किसी तरह कार्यकी सिद्धिको पाकर 'यह प्रतिनिधिभूत देवताके द्वारा ही कार्य सिद्ध हुआ है' ऐसा मान जो मनुष्य शस्त्रोंसे अपने ही शरीरको चीर खूनकी बलि देने लगता है वह दूसरोंके शरीरके छेदने में दयासहित कैसे हो सकता है ? भावार्थ-मनुष्यकी १. निष्पापाम् । २. महिषास्त्रपानवधिका म.। ३. -मावहतीहि म. । ४. खलु लोकभयात्तनु-मः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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