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________________ ५७२ हरिवंशपुराणे उग्रसेनस्य तनया धरो गुणधरोऽपि च । युक्तिको दुर्धरश्चापि सागरश्चन्द्रसंज्ञकः ॥३९॥ उग्रसेनपितृव्यस्य शान्तनस्य सुतास्त्वमी । महासेन शिविस्वस्थविषदानन्तमित्रकाः' ॥४०॥ महासेनस्य तनयः सुषेण इति नामतः । हृदिको विषमित्रस्य शिवः सत्यक इत्यसौ ॥४१॥ हृदिकास्कृतिधर्मासौ दृढधर्मा च देहजः । सत्यकाद्वज्रधर्मोऽभूदसंगस्तु तदङ्गजः ॥४२॥ समुद्रविजयोद्भता महासत्यदढाधिकाः । नेमयोऽरिष्टनेमीशः सनेमिर्जयसेनकः ॥४३॥ महीजयः सुफल्गु श्च तेजःसेनो मयस्तथा । मेघाख्यः शिवनन्दश्च चित्रको गौतमादयः ॥४४॥ अक्षोभ्यस्योद्धवः सुनूर्वचःक्षुमितवारिधिः । अम्भोधिजलधी चान्यौ वामदेवदृढव्रतौ ॥४५॥ तनयाः पञ्च विख्याता जाताः स्तिमितसागरात् । ऊर्मिमान् वसुमान्वीरः पातालस्थिर इत्यमी ॥४६॥ विद्यत्प्रभो नरपतिर्माल्यवान् गन्धमादनः । इत्यमी सस्यसत्वाख्यास्त्रयो हिमवतः सुताः ॥४७॥ विजयस्यापि षट पुवा निष्कम्पोऽकम्पनो 'बलिः । युगन्तः केशरी धीमानलम्बुष इति श्रताः ॥४८॥ महेन्द्रो मलयः सह्यो गिरिः शैलो नगोऽचलः । इत्येतेऽन्वर्थनामानः सप्ताचलशरीरजाः ॥४९॥ धरणस्यात्मजाः पञ्च वासुकिः स धनंजयः । कर्कोटकः शतमुखो विश्वरूपश्च नामतः ॥५०॥ दुष्पूरो दुर्मुखामिख्यो दुर्दों दुर्धरोऽपि च । सूनवः पूरणस्यामी चस्वारश्चतुरक्रियाः ॥५१॥ पुत्राः षडभिचन्द्रस्य चन्द्रनिर्मलकीर्तयः । चन्द्रः शशाङ्कचन्द्राभौ शशी सोमोऽमृतप्रभः ॥५२॥ तनया वसुदेवस्य बहुसंख्या महाबलाः । नामतः कतिचिद्वच्मि श्रणु श्रेणिक तानहम् ॥५३॥ पुत्री विजयसेनाया अकरकरनामको । ज्वलनानिलवेगाख्यौ श्यामाख्यायाः शरीरजी ॥५४॥ पुत्राः गन्धर्वसेनायास्त्रयो लोका इव त्रयः । वायुवेगोऽमितगतिर्महेन्द्र गिरिरित्यसौ ॥५५॥ धर, गुणधर, युक्तिक, दुर्धर, सागर और चन्द्र ये राजा उग्रसेनके पुत्र थे ।।३९।। महासेन, शिवि, स्वस्थ, विषद और अनन्तमित्र ये उग्रसेनके चाचा राजा शान्तनके पुत्र थे ।।४०|| इनमें महासेनके सुषेण, विषमित्रके हृदिक, शिविके सत्यक, हृदिकके कृतिधर्मा और दृढधर्मा, सत्यकके वज्रधर्मा और वज्रधर्माके असंग नामका पुत्र हुआ ॥४१-४२।। राजा समुद्रविजयके महानेमि, सत्यनेमि, दृढनेमि, भगवान् अरिष्टनेमि, सुनेमि, जयसेन, महीजय, सुफल्गु, तेजःसेन, मय, मेघ, शिवनन्द, चित्रक और गौतम आदि अनेक पुत्र हुए ॥४३-४४|| अक्षोभ्यके, अपने वचनोंसे समुद्रको क्षुभित करनेवाला उद्धव, अम्भोधि, जलधि, वामदेव और दृढव्रत ये पांच पुत्र प्रसिद्ध थे। स्तिमितसागरसे ऊर्मिमान्, वसुमान्, वीर और पातालस्थिर ये चार पुत्र उत्पन्न हुए थे ।।४५-४६।। राजा विद्युत्प्रभ, माल्यवान्, और गन्धमादन ये तीन हिमवत्के पुत्र थे तथा ये तीनों ही सत्यव्रत और पराक्रमसे युक्त थे ।।४७|निष्कम्प, अकम्पन, वाल, युगन्त, केशरिन् और बुद्धिमान् अलम्बुष ये छह पुत्र विजयके प्रसिद्ध थे ।।४८॥ महेन्द्र, मलय, सह्य, गिरि, शैल, नग और अचल, सार्थक नामोंको धारण करनेवाले ये सात पुत्र अचलके थे ||४९|| वासुकि, धनंजय, कर्कोटक, शतमुख और विश्वरूप ये पाँच पुत्र धरणके थे ॥५०॥ दुष्पूर, दुर्मुख, दुर्दर्श और दुधंर, चतुर क्रियाओंको धारण करनेवाले ये चार पुत्र पूरणके थे ॥५१॥ चन्द्र, शशांक, चन्द्राभ, शशिन्, सोम और अमृतप्रभ चन्द्रमाके समान निर्मल कीतिको धारण करनेवाले ये छह पुत्र अभिचन्द्रके थे ॥५२॥ और वसुदेवके महाबलवान् अनेक पुत्र थे। हे श्रेणिक ! मैं यहां उनमें से कुछके नाम कहता हूं सो सुन ॥५३॥ वसुदेवको विजयसेना रानीसे अक्रूर और क्रूर नामके दो पुत्र हुए थे। श्यामा नामक रानीसे ज्वलन और अग्निवेग ये दो पुत्र उत्पन्न हुए थे ॥५४॥ गन्धर्वसेनासे वायुवेग, अमितगति और महेन्द्रगिरि ये तीन पुत्र हुए थे। ये तीनों पुत्र ऐसे जान पड़ते थे मानो तीनों लोक ही १. विषादानन्त-म.। २. बलः म.। २. युगान्तः म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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