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________________ सप्तचत्वारिंशः सर्गः १६१ गाढमोहोदयात्तस्यास्ततः परवशात्मनः । कर्षन्तो हृदयक्षोणी प्रवृत्ता दुर्मनोरथाः ॥५१॥ स्वाङ्गैरस्याङ्गसङ्गं या लभेत शयने सकृत् । कामिनी भुवने सैका शेषास्त्वाकृतिमात्रकम् ॥५२॥ रूपलावण्यसौभाग्यवैदग्ध्यं गुणगोचरम् । 'कामाश्लेषस्य सौलभ्ये दौलभ्ये स्यात्तणं तु मे ॥५३॥ इतिप्रवृत्तसंकल्पामसंमाविततन्मनाः । तां प्रणम्य स लब्धाशीः प्रद्युम्नः स्वगृहं गतः ॥५४॥ इतिप्रबलदुःखेयं खेचरी निखिलाः क्रियाः । विसस्मार स्मराश्लेषसुखलाभ मनोरथा ॥५५॥ अस्वस्थामपरेास्तां प्रद्युम्नो द्रष्टुमागतः । अद्राक्षीद्विसिनीपत्रपर्यस्ततनुमाकुलाम् ॥५६॥ पृच्छति स्म स त कामः शरीरास्वास्थ्यकारणम् । इङ्गितैराङ्गिकैः सापि वाचिक्यैश्च व्यबोधयत् ॥५॥ वैपरीत्यं ततो ज्ञात्वा निन्दित्वा कर्मचेष्टितम् । स मात्रपत्यसंबन्धप्रत्यायनपरोऽभवत् ॥५॥ सापि तस्मै यथावृत्तमादिमध्यावसानतः । अटवीलामसंवृद्धिविद्यालाभानवेदयत् ॥५९॥ स्वसंबन्धं ततः श्रुत्वा संदिग्धार्थमतिर्गतः । दृष्ट्वा सागरचन्द्राख्यं मुनि चैत्यगृहे मुदा ॥६॥ नत्वा पृष्ट्वा ततो ज्ञात्वा सर्वान् पूर्वमवान्निजान् । तथा कनकमालायाश्चन्द्राभायाः पुरा भवे ॥६॥ सम्यग्दर्शनसंशुद्धो ज्ञातप्रज्ञप्तिलामकः । गत्वा शीलधनोप्राक्षीन्मदनो मदनातुराम्॥६२॥ किया ॥५०॥ तदनन्तर मोहका तीव्र उदय होनेसे उसको आत्मा विवश हो गयी और हृदयरूपी भूमिको खोदते हुए अनेक खोटे विचार उसके मनमें उठने लगे ॥५१॥ वह विचारने लगी कि जो स्त्री शय्यापर अपने अंगोंसे इसके अंगोंके स्पर्शको एक बार भी प्राप्त कर लेती है संसारमें वही एक स्त्री है अन्य स्त्रियां तो स्त्री की आकृतिमात्र हैं ॥५२॥ यदि मुझे प्रद्युम्नका आलिंगन प्राप्त होता है तो मेरा रूप, लावण्य, सौभाग्य तथा चातुर्य सफल है और दुर्लभ रहता है तो यह सब मेरे लिए तृणके समान तुच्छ है ।।५३।। जिसके मनमें कनकमालाके ऐसे विचारोंको कल्पना भी नहीं थी ऐसा प्रद्युम्न, पूर्वोक्त संकल्प-विकल्प करनेवाली कनकमालाको प्रणाम कर तथा आशीर्वाद प्राप्तकर अपने घर चला गया ।।५४|| उधर प्रद्युम्नके आलिंगनजन्य सुखको प्राप्त करनेकी जिसको लालसा लग रही थी ऐसी विद्याधरी कनकमाला प्रबल दुःखसे दुःखी हो सब काम-काज भूल गयो ॥५५।। दूसरे दिन उसके अस्वस्थ होनेका समाचार पा प्रद्युम्न उसे देखने गया तो क्या देखता है कि कनकमाला कमलिनीके पत्तोंकी शय्यापर पड़ी हुई बहुत व्याकुल हो रही है ॥५६॥ प्रद्युम्नने उससे शरीरको अस्वस्थताका कारण पूछा तो उसने शरीर और वचनसम्बन्धी चेष्टाओंसे अपना अभिप्राय प्रकट किया ।।५७|| तदनन्तर इस विपरीत बातको जानकर और कर्मको चेष्टाओंको निन्दा कर प्रद्युम्न उसे माता और पुत्रका सम्बन्ध बतलाने में तत्पर हुआ ॥५८॥ इसके उत्तरमें कनकमालाने भी उसे आदि, मध्य और अन्त तक जैसा वृत्तान्त हुआ था वह सब बतलाते हुए कहा कि तू मुझे अटवीमे किस प्रकार मिला, किस प्रकार तेरा लालन-पालन हुआ और किस प्रकार मुझे विद्याओंका लाभ हुआ ॥५९|| कनकमालासे अपना सम्बन्ध सुन प्रद्युम्नके मनमें संशय उत्पन्न हुआ जिससे वह स्पष्ट पूछनेके लिए जिन-मन्दिरमें विद्यमान सागरचन्द्र मुनिराजके पास गया और हर्षपूर्वक उन्हें नमस्कार कर उसने उनसे अपने सब पूर्वभव पूछे । पूर्वभव ज्ञात कर उसे यह भी मालूम हो गया कि यह कनकमाला पूर्वभवमें चन्द्राभा थी॥६०-६१॥ शुद्ध सम्यग्दर्शनके धारक प्रद्युम्नको मुनिराजसे यह भी विदित हुआ कि तुझे कनकमालासे प्रज्ञप्ति विद्याका लाभ होनेवाला है। तदनन्तर शीलरूपी धारण करनेवाले प्रद्युम्नने जाकर कामसे पीड़ित कनकमालासे प्रज्ञप्ति विद्याके विषयमें पूछा ।।६२॥ १. प्रद्युम्नालिङ्गनस्य । २. लाभः मनोरथा म.। ३. -राङ्गितैः म. घ., ङ,-रागितैः ग.। ४. सोऽपि म.। ५. मदनातुरम् म.. ७१ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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