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________________ ५५५ षट्चत्वारिंशः सर्गः साधुदर्शनतः शान्तः 'प्रापमर्यमनुष्यताम् । धनदेवः पिता चात्र माता मे सुकुमारिका ॥५०॥ कुमारदेवसंज्ञोऽहं मात्रा च मम सुव्रतः । मारितः साधुराहारं दत्त्वा विषविमिश्रितम् ॥५१॥ प्रविश्य नरकं पापा दुःखं साधुवधोद्भवम् । अनुभूय पुनस्तिर्यगनारकेष्वटतिस्म सा ॥५२॥ अव्रतोऽहमपि भ्रान्त्वा संसारं तीव्रवेदनम् । मातरिश्वतया वृत्तो(?) नुमोहोमातरिश्वभिः ॥५३॥ सितेन तापसेनान्ते जनितो मधुसंज्ञकः । तापस्यां मृगशृङ्गिण्यां प्रवृद्धस्तापसाश्रमे ॥५४॥ मुनेविनयदत्तस्य दानमाहात्म्यदर्शनात् । प्रव्रज्य स्वर्गमारुह्य जातोऽहं कीचकश्च्युतः ॥५५॥ चिरं पर्यट्य संसारं सुदःखं सकमारिका । मानुषी दुर्भगीमता भताभतासुखावहा ॥५६॥ सा चानुमतिका नाम्ना सनिदानतपोयुता । जातेयं द्रौपदी तेन मोहोऽस्या मे महानभूत् ॥५७॥ वसन्ततिलकावृत्तम् माता स्वसा च तनुजा प्रियकामिनीत्वं मातृस्वसृत्वदुहितृत्वमुपैति पत्नी । संसारचक्रपरिवर्तिनि जीवलोके ही संकरव्यतिकरी नियती भवेताम् ॥५८॥ वैचित्र्यमेतदवगम्य मवस्य भव्या वैराग्यमेत्य सुखतो महतोऽप्यमुष्य । संसारकारणनिवृत्तधियः सुवृत्ता मोक्षार्थमेव महता तपसा यतन्ताम् ॥५५॥ इत्यादि तस्य वचनं मुनिकोचकस्य श्रुत्वा सुरः सुरवधूभिरमा तदानीम् । सम्यक्त्वरनवरभषणभूषितात्मा नत्वा गुरुंधतियुतोऽन्तरधादनान्ते ॥६॥ था, क्षुद्र मनुष्योंका वैरी क्षुद्र नामका म्लेच्छ था, उस समय मेरे परिणाम अत्यन्त रौद्र रूप थे ॥४९|| एक बार अचानक ही मनिराजके दर्शन कर मैं अत्यन्त शान्त हो गया और वैश्य कूलमें मनुष्य पर्यायको प्राप्त हुआ। इस समय मेरे पिता धनदेव और माता सुकुमारिका थी तथा मेरा निजका नाम कुमारदेव था। एक बार मेरी माताने विष मिला आहार देकर एक सुव्रत नामक मुनिको मार डाला ||५०-५१।। उसके फलस्वरूप वह पापिनी नरक पहुंची और वहाँ मुनिके घातसे उत्पन्न दुःख भोगकर तिर्यंच तथा नरकगतिके दुःख भोगती रही ।।५२।। मैं भी संयमसे रहित था इसलिए तीव्र वेदनावाले संसारमें भटककर पापरूपी पवनसे प्रेरित हुआ अपनी माताके जीवके कुत्ता हुआ। तदनन्तर तापसोंके किसी तपोवनमें सित नामक तापसके द्वारा मृगशृंगिणी नामक तापसीके मधु नामका पुत्र हुआ तथा तापसोंके आश्रममें ही मैं वृद्धिको प्राप्त हुआ ॥५३-५४॥ एक दिन किसी श्रावकने विनयदत्त नामक मुनिराजको आहार दान दिया। उसका माहात्म्य देख मैंने दीक्षा ले ली और उसके फलस्वरूप स्वर्गारोहण कर वहाँसे च्युत होता हुआ कीचक हुआ ||५५।। माता सुकुमारिका चिरकाल तक भ्रमण कर संसारमें तीव्र दुःख भोगती रही। अन्तमें वह दौर्भाग्यसे युक्त दुःखोंको भोगनेवाली मानुषी हुई ॥५६॥ अनुमतिका उसका नाम था। अन्तमें वह निदान सहित तपसे युक्त हो द्रौपदी हुई है। इसी कारण इसमें मुझे मोह उत्पन्न हो गया था ।।५७|| देखो, माता बहन हो जाती है, पुत्री प्रिय स्त्री हो जाती है, और स्त्री, माता, बहन तथा पुत्रीपनेको प्राप्त हो जाती है। आश्चर्यकी बात है कि संसाररूपी चक्रके साथ घूमनेवाले जीवोंमें संकर और व्यतिकर नियमसे होते रहते हैं ।।५८॥ इसलिए हे भव्यजनो ! संसारकी इस विचित्रताको अच्छी तरह समझकर वैषयिक सुखसे भले ही वह कितना ही महान् क्यों न हो विरक्त होओ और संसारके कारणोंसे विरक्त हो सदाचारके धारी बन विशाल तपसे मोक्षके लिए ही यत्न करो ॥५९|| इस प्रकार कीचक मुनिके वचन सुन उस यक्षने अपनी देवियोंके साथ-साथ अपनी १. वैश्यकुलम् 'ऊरव्या ऊरुजा अर्या वैश्या भूमिस्पृशो विशः' इत्यभिधानात् । 'अर्यः स्वामिवैश्ययोः' इति पाणिनिसूत्रम् । -मार्यमनुष्यताम् म., क., ख., ग., ध.। २. पापपवनैः। ३. भूतामाता सुखावहा घ. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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