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________________ षट्चत्वारिंशः सर्गः ५५३ चूलिका नगरी राजा चूलिकस्तस्य कामिनी । विकचा विकचाब्जास्या शतपुत्रपविनिता ॥२६॥ कोचकः प्रथमस्तेषां प्रथमश्चण्डकर्मणाम् । रूपयौवनविज्ञानशौर्यद्रव्यमदाविलः ॥२७॥ विराटनगरं जातु स्वसारं स सुदर्शनाम् । आगतो द्रष्टुमत्रतां दृष्टवान् द्रौपदी सतीम् ॥२८॥ गन्धयुकिविशेषेण सुगन्धीकृतदिड मुखाम् । रूपलावण्यसौभाग्यगुणपूरितविग्रहाम् ॥२९॥ तस्यां दर्शनमात्रेण मानिनोऽपि मनोगतम् । दैन्यमन्यत्र यातस्य तस्य तन्मयतां गतम् ॥३०॥ अनेझोपाययोगैस्तामुपलोमयतामुना । स्वतोऽपि परतोऽप्यस्या नालाभि हृदये स्थितिः ॥३१॥ प्रत्याख्यातस्य पृष्टस्य तृणीभूतस्य तस्य सा । निर्बन्धं भीमसेनाय शैलन्ध्री तं न्यवेदयत् ॥३॥ ततः कुपितचित्तोऽसौ शैलन्ध्रीवेषभृदबली । प्रदोषे कृतसंकेतमेकान्ते मदनातुरम् ॥३३॥ वारीबन्धमिवायातं स्पर्शान्धं गन्धवारणम् । कण्ठे जग्राह बाहुभ्यां स्पर्शामीलितलोचनाम् ॥३४॥ भुमी निपात्य पादाभ्यामरस्याक्रम्य कामिनम् । पिपेष मुष्टिनिर्धातैर्निर्घातरिव भूधरम् ॥३५॥ तथा तस्य तदा श्रद्धां प्रपूर्य परयोषिति । अमुचद् व्रज पापेति दयमानो महामनाः ॥३६॥ महावैराग्यसंपन्नस्ततो विषय हेतुकम् । प्राबजस्कीचकः श्रित्वा मुनीन्द्रं रतिवर्धनम् ॥३७॥ इसी पथिवीतलपर एक चलिका नामकी नगरी थी। उसके राजाका नाम चलिक था। राजा चूलिकको, विकसित कमलके समान मुखवाली एवं सौ पुत्रोंसे पवित्र विकचा नामकी स्त्री थी ॥२६|| विकचाके सौ पुत्रोंमें सबसे बड़े पुत्रका नाम कीचक था। यह कीचक क्रूरकर्मा मनुष्योंमें अग्रणी था तथा रूप, यौवन, विज्ञान, शूर-वीरता और धनके मदसे मलिन था ॥२७।। एक बार वह कीचक, अपनी बहन सुदर्शनाको देखनेके लिए विराटनगर आया। वहां उसने द्रौपदीको देखा ॥२८॥ उस समय द्रौपदी किसी विशिष्ट सुगन्धित पदार्थके संयोगसे समस्त दिशाओंको सुगन्धित कर रही थी एवं रूप, लावण्य, सौभाग्य आदि गुणोंसे उसका शरीर परिपूर्ण था ॥२९|| यद्यपि कीचक मानी था तथापि उसका मन देखते ही द्रौपदीके विषयमें दोनताको प्राप्त हो गया। वह वहाँसे अन्यत्र जाता था तब भी उसका मन द्रौपदीके साथ तन्मयताको ही प्राप्त रहता था ॥३०॥ कीचकने अनेक उपायोंसे द्रौपदीको स्वयं लुभाया तथा दूसरोंके द्वारा भी उसे प्रलोभन दिखलाये पर वह उसके हृदयमें स्थितिको प्राप्त न कर सका ॥३१॥ द्रौपदी उसे तृणके समान तुच्छ समझती थी और उसे मना भी कर चुकी थी पर वह अपनी धृष्टता नहीं छोड़ता था अतः विवश हो शैलन्ध्रो ( सैरन्ध्री ) का वेष धारण करनेवाली द्रौपदीने एक दिन उसकी इस दुहंठकी शिकायत भीमसेनसे कर दी ॥३२॥ फिर क्या था, भीमसेनका हृदय क्रोधसे उबल उठा। उन्होंने कामातुर कीचकको द्रौपदीके द्वारा सायंकालके समय एकान्त स्थानमें मिलनेका संकेत करा दिया और आप स्वयं शैलन्ध्री ( द्रौपदी ) का वेष रख उस स्थानपर पहुँच गये। आप पन्त बलवान् तो थे ही ॥३३।। जिस प्रकार हस्तिनीके स्पर्शसे अन्धा मदोन्मत्त हाथी बन्धनके स्थानमें स्वयं आ जाता है उसी प्रकार मदनातुर कीचक उस संकेत-स्थानमें स्वयं आ गया। तदनन्तर स्पर्शजन्य आनन्दके अतिरेकसे जिसके नेत्र निमीलित हो रहे थे ऐसे उस कीचकके कण्ठेको द्रौपदीका वेष धारण करनेवाले भीमसेनने अपनी दोनों भुजाओंसे आलिंगित किया और पृथिवीपर पटककर उसकी छातीपर दोनों पैरोंसे चढ़ गये। जिस प्रकार वज्राघातसे किसी पर्वतको चूर-चूर किया जाता है उसी प्रकार मजबूत मुक्कोंके प्रहारसे उसे चूर-चूर कर दिया। इस प्रकार उसकी परस्रो विषयक आकांक्षाको पूर्ण कर महामना भीमसेनने दयायुक्त हो 'अरे पापी जा' यह कह उसे छोड़ दिया ॥३४-३६।। तदनन्तर विषयोंका प्रत्यक्ष फल देख कीचकको उनसे अत्यन्त वैराग्य उत्पन्न हो गया १. विज्ञानं शौर्य म. । २. द्रौपदीमयताम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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