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________________ त्रिचत्वारिंशः सर्गः ५३१ प्रास्त्रीवैरानुबन्धेन स प्रबोधमुपेयुषा । शिशुं व्ययोजयन्मात्रा धिग्वरं पापवर्धनम् ।।२२२॥ प्रद्युम्नो रक्षितोऽपायात्स्वपुण्यः पूर्वसंचितैः । पुण्यानामेव सामर्थ्यमपायपरिरक्षणे ॥२२३।। सीमंधरजिनेन्द्रेण तदानीमिति भाषितम् । श्रुत्वा पद्मरथश्चक्री प्रणनाम प्रमोदवान् ॥२२४॥ नारदोऽपि जिनं नस्वा प्रमोदेन वशीकृतः । समुत्पत्य मरुन्मार्गे मेघकूटं समाययौ ॥२२५।। कालसंवरमानन्ध पुत्रलाभोरसवेन सः । देवी कनकमालां च स्तुत्वा पुत्रवतीं मुहुः ।।२२६।। रुक्मिण्यास्तनुजं दृष्ट्वा कुमारशतसेवितम् । गूढवृत्तप्रमोदेन रोमाञ्चमभजत्परम् ।।२२७।। प्रणामेनार्चितस्तेषां दत्त्वाशिषमतिदूतम् । वियदुत्पत्य संप्राप्तो द्वारिकां नारदो मुनिः ॥२२॥ यथागतं यथादृष्टं यथाश्रुतमशेषतः । स प्रद्युम्नकथां कृत्वा यादवेभ्यो मुदं ददौ ॥२२९॥ देवीं च रुक्मिणीं दृष्ट्वा विकासिमुखपङ्कजः । सीमंधरजिनेन्द्रोक्तं प्रतिपाद्य पुनर्जगौ ॥२३०॥ दृष्टो रुक्मिणि ते पुत्रो मया क्रीडन् कुमारकः । खचरेशगृहे देवकुमार इव रूपवान् ॥२३ ॥ लब्धषोडशलामोऽयं कृतप्रज्ञप्तिसंग्रहः । अमोघं षोडशे वर्षे समेष्यति सुतस्तव ॥२३२॥ 'तस्यागमनवेळायामुद्याने तव रुक्मिणि । शिखी कृजिष्यतेऽस्युच्चैरकाले प्रियसूचनः ॥२३३॥ शुष्का तद्गतवेलायामुद्यानमणिवापिका । सुतागमनवेलायां पूर्यते साम्बुजाम्बुना ॥२३४॥ तव शोकापनोदाय शोकापनुदसूचकः । अशोकः पादपोऽकाले मुञ्चत्यङ्कुरपल्लवान् ॥२३५॥ ज्यों ही उसे पूर्वजन्मसम्बन्धी वैरका स्मरण आया त्यों ही उसने बालक प्रद्युम्नको मातासे वियुक्त कर दिया सो आचार्य कहते हैं कि पापको बढ़ानेवाले इस वैर-भावको धिक्कार है ।।२२२।। अपने पूर्व-संचित पुण्यने प्रद्युम्नकी मृत्युसे रक्षा की सो ठीक ही है क्योंकि अपायसे रक्षा करने में पुण्यकी ही सामर्थ्य कारण है ।।२२३।। इस प्रकार उस समय सीमन्धर जिनेन्द्रके द्वारा प्रतिपादित प्रद्युम्नका चरित श्रवण कर चक्रवर्ती राजा पद्मरथने बड़ी प्रसन्नतासे जिनेन्द्र भगवान्को प्रणाम किया ॥२२४॥ इधर आनन्दके वशीभूत हुए नारद, सीमन्धर जिनेन्द्रको नमस्कार कर आकाशमार्गमें जा उड़े और मेघकूट नामक पर्वतपर आ पहुंचे ।।२२५।। वहां पुत्रलाभके उत्सवसे नारदने कालसंवर राजाका अभिनन्दन किया तथा पुत्रवती कनकमाला नामकी देवीको स्तुति की ।।२२६।। सैकड़ों कुमार जिसकी सेवा कर रहे थे ऐसे रुक्मिणो-पुत्रको देख नारदको बड़ी प्रसन्नता हुई और वे प्रसन्नताके वेगको मनमें छिपाये हुए परम रोमांचको प्राप्त हुए ॥२२७|| कालसंवर आदिने नमस्कार कर नारदका सम्मान किया। तदनन्तर आशीर्वाद देकर वे बहुत ही शोघ्र आकाशमें उड़कर द्वारिका आ पहुँचे ।।२२८॥ वहां आकर जिस प्रकार गये, जिस प्रकार देखा और जिस प्रकार सुना वह सब प्रकट कर नारदने प्रद्युम्नकी कथा कर यादवोंके लिए हर्ष प्रदान किया ।।२२९।। तदनन्तर जिनका मुखकमल खिल रहा था ऐसे नारदने रुक्मिणी रानीको देखकर उसे सीमन्धर जिनेन्द्रके द्वारा कहा सब समाचार कह सुनाया ॥२३०।। अन्तमें उन्होंने कहा कि हे रुक्मिणि ! मैंने विद्याधरोंके राजा कालसंवरके घर क्रीड़ा करता हुआ तुम्हारा पुत्र देखा है। यह देवकुमारके समान अत्यन्त रूपवान् है ।।२३१।। सोलह लाभोंको प्राप्त कर तथा प्रज्ञप्तिविद्याका संग्रह कर तुम्हारा वह पुत्र सोलहवें वर्षमें अवश्य ही आवेगा ॥२३२। हे रुक्मिणि ! जब उसके आनेका समय होगा तब तेरे उद्यानमें असमयमें हो प्रिय समाचारको सूचित करनेवाला मयूर अत्यन्त उच्च स्वरसे शब्द करने लगेगा ॥२३३॥ तेरे उद्यानमें जो मणिमयी वापिका सूखी पड़ी है वह उसके आगमनके समय कमलोंसे सुशोभित जलसे भर जावेगी ॥२३४।। तुम्हारा शोक दूर करनेके लिए, शोक दूर होनेकी सूचना देनेवाला अशोक वृक्ष १. सुतागमन ख., घ, । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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