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________________ ५२२ हरिवंशपुराणे प्राप्तावपश्यतां विप्राववधिज्ञानचक्षुषम् । जनसागरमध्यस्थं साध्विन्द्रं धर्मवादिनम् ।।१०।। महिषाभ्यामिव क्षोमो माभूदाभ्यामिहाधुना । सद्धर्मश्रवणस्येति शुश्रहितबुद्धिना ॥१०॥ साधुनावधिनेत्रेण दूरात्सात्यकिना तकौ । इत आगम्यतां विप्रावित्याहूतौ पुरस्थितौ ॥११०॥ ततो लोकस्तकौ दृष्ट्वा सावष्टम्भौ यतेः पुरः। आपुपूर पयःपूरैः प्रावृषीव महानदः ।।११।। अतः प्राह यतिः प्राप्ती कुतः पण्डितमानिनौ । प्राहतुस्तौ न किं ज्ञाती शालिग्रामादिहागतौ ।।११२।। सात्यकिः प्राह सत्यं भोः शालिग्रामादुपागती। किंत्वनाद्यन्तसंसारे संसरन्तौ कुतो गतेः ॥११३।। अन्यस्यापि च दुर्बोधमेतदित्युदिते यतिः । नैवमित्यगदीद विप्रौ ! यतां कथयाम्यहम् ॥११४॥ ग्रामस्यास्यैव सीमान्ते शृगालौ कर्मनिर्मिती । युवां परस्परप्रीतौ जातौ जन्मन्यनन्तरे ॥११५।। आसीत्प्रवरको नाम्ना ग्रामेऽत्रव कृषीबलः । विप्रः प्रकृष्य स क्षेत्रं महावर्षानिलार्दितः ॥११६॥ मुक्त्वोपकरणं क्षेत्रे वटवृक्षतलेऽखिलम् । कम्पमानशरीरोगात् क्षुद्रोगातिवशीकृतः ॥११७॥ सप्ताहोरात्रवर्षण प्राणिसंहारकारिणा । आोपकरणं ताभ्यां तिर्यग्भ्यां भक्षितं क्षुधा ॥११॥ जातोदरमहाशूलौ प्रसह्यासह्य वेदनाम् । अकामनिर्जरायोगादर्जितेनोर्जितायुषा ।।११९॥ उस समय अवधिज्ञानरूपी नेत्रके धारक, साधुशिरोमणि नन्दिवर्धनगुरु, समुद्र के समान अपार जनसमूहके मध्यमें स्थित हो धर्मका उपदेश दे रहे थे। जब दोनों ब्राह्मण उनके पास पहुंचे तब 'भैंसाओंके समान इन दोनोंसे इस समय यहां समीचीन धर्मके श्रवणमें बाधा न आवे' इस प्रकार श्रोताओंका हित चाहनेवाले अवधिज्ञानी सात्यकि मुनिने उन दोनों ब्राह्मणोंको दूरसे देख 'हे ब्राह्मणो ! यहां आइए' इस तरह बुला लिया और आकर वे उनके सामने बैठ गये ।।१०८-११०॥ तदनन्तर उन अहंकारी ब्राह्मणोंको सात्यकि मुनिराजके सामने बैठा देख, लोगोंने आ-आकर उनके सामनेकी भूमिको उस प्रकार भर दिया जिस प्रकार कि वर्षाऋतुमें महानद जलके प्रवाहसे भर देता है। भावार्थ-कौतुकसे प्रेरित हो लोग मुनिराजके पास आ गये ॥१११॥ तदनन्तर मनिराजने कहा कि विद्वानो! आप लोग कहां से आये हैं ? इसके उत्तर में ब्राह्मणोंने कहा कि क्या आप नहीं जानते इसो शालिग्रामसे आये हैं ॥११२॥ सात्यकि मुनिराजने कहा कि हाँ यह तो सत्य है कि आप शालिग्रामसे आये हैं परन्तु यह तो बताइए कि इस अनादिअनन्त संसारमें भ्रमण करते हुए आप किस गतिसे आये हैं ? ||११३।। ब्राह्मणोंने कहा कि यह बात तो हम लोग ही क्या दूसरेके लिए भी दुर्जेय है अर्थात् इसे कोई नहीं जान सकता। . तब मुनिराजने कहा कि हे ब्राह्मणो! सुनो, यह बात नहीं है कि कोई नहीं जान सकता, सुनिए, मैं कहता हूँ ॥११४॥ तुम दोनों भाई इस जन्मसे पूर्व जन्ममें इसी शालिग्रामको सीमाके निकट अपने कमसे दो शृगाल थे और दोनों ही परस्परकी प्रीतिसे युक्त थे ॥११५।। इसी ग्राममें एक प्रवरक नामका ब्राह्मण किसान रहता था। एक दिन वह खेतको जोतकर निश्चिन्त हुआ ही था कि बड़े जोरसे वर्षा होने लगी तथा तीव्र आंधी आ गयी। उनसे वह बहुत पीड़ित हुआ, उसका शरीर कांपने लगा और भूख-रूपी रोगने भी उसको खूब सताया जिससे वह खेतके पास ही वटवृक्षके नीचे अपना चमड़ेका उपकरण छोड़कर घर चला गया ॥११६-११७|| प्राणियोंका संहार करनेवाली वह वर्षा लगातार सात दिन-रात तक होती रही। इस बीचमें दोनों शृगाल भूखसे अत्यन्त व्याकुल हो उठे और उन्होंने उस किसानका वह भीगा हुआ उपकरण खा लिया ॥११८॥ कुछ समय बाद पेटमें बहुत भारी शुलकी वेदना उठनेसे उन दोनों शृगालोंको असह्य वेदना सहन करनी पड़ी। अकामनिर्जराके योगसे उन्हें प्रशस्त आयुका बन्ध हो गया १. सगीं । २. आययुश्च म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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