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________________ द्वितीयः सर्गः उत्तराफाल्गुनीप्राप्ते' शुक्लध्यानी निशाकरे । निहत्य धातिसंघातं केवलज्ञानमाप्तवान् ॥५॥ केवलस्य प्रभावेण सहसा चलितासनाः । आगत्य महिमां चक्रुस्तस्य सर्वे सुरासुराः ॥६०॥ षटषष्टिदिवसान भूयो मौनेन विहरन् विभुः । आजगाम जगत्ख्यातं जिनो राजगृहं पुरम् ॥६॥ आरुरोह गिरिं तत्र विपुलं विपुलश्रियम् । प्रबोधार्थं स लोकानां भानुमानुदयं यथा ॥६२।। ततः प्रवुद्धवृत्तान्तैरापतद्भिरितस्ततः । जगत्सुरासुरैाप्तं जिनेन्द्रस्य गुणैरिव ॥६॥ सौधर्मायैस्तदा देवैः परीतोऽभात् स भूधरः । नाभेयाधिष्ठितः पूर्व यथाष्टापदपर्वतः ॥६॥ चतुराशामुखद्वारस्थितद्वादशगोपुरम् । कृतं रत्नमयं देवैः प्राकारवलयत्रयम् ॥६५॥ जाते योजनविस्तीर्ण सरणे समवादिके । विमागा द्वादशामासन्नमास्फाटिकभित्तयः ॥१६॥ प्रातिहायुतोऽष्टाभिश्चतुस्त्रिंशन्महाद्भुतैः । तत्र देवैर्वृतोऽभासीजिनश्चन्द्र इव ग्रहैः ॥६॥ इन्द्राग्निवायुभूत्याख्याः कौडिन्याख्याश्च पण्डिताः । इन्द्रनोदनयाऽऽयाताः समवस्थानमर्हतः ॥६॥ प्रत्येकं सहिता सर्वे शिष्याणां पञ्चमिः शतैः । त्यक्ताम्बरादिसंबन्धाः संयम प्रतिपेदिरे ॥६९॥ सुता चेटकराजस्य कुमारी चन्दना तदा । धौतैकाम्बरसंवीता जातार्याणां पुरःसरी ॥७॥ श्रेणिकोऽपि च संप्राप्तः सेनया चतुरङ्गया। सिंहासनोपविष्टं तं प्रणनाम जिनेश्वरम् ।।७१॥ छत्रचामरभृङ्गारैः कलशध्वजदर्पणैः । व्यञ्जनैः सुप्रतीकैश्च प्रसिद्धैरष्टमङ्गलः ॥७२॥ दिनके उपवासका नियम कर वे साल वक्षके समीप स्थित शिलातलपर आतापन योगमें आरूढ हुए ॥५८।। उसी समय जबकि चन्द्रमा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें स्थित था तब शुक्लध्यानको धारण करनेवाले वर्धमान जिनेन्द्र घातिया कर्मोंके समूहको नष्ट कर केवलज्ञानको प्राप्त हुए ॥५९।। केवलज्ञानके प्रभावसे सहसा जिनके आसन डोल उठे थे ऐसे समस्त सुर और असुरोंने आकर उनके केवलज्ञानकी महिमा को-ज्ञानकल्याणकका उत्सव किया ॥६०।। तदनन्तर छयासठ दिन तक मौनसे बिहार करते हुए श्री वर्धमान जिनेन्द्र जगत्प्रसिद्ध राजगृह नगर आये ॥६१।। वहाँ जिस प्रकार सूर्य उदयाचलपर आरूढ़ होता है उसी प्रकार वे लोगोंको प्रतिबुद्ध करनेके लिए विपुल लक्ष्मीके धारक विपुलाचलपर आरूढ़ हुए ॥६२।। तदनन्तर जिनेन्द्र भगवान्के आगमनका वृत्तान्त जान चारों ओरसे आनेवाले सुर और असुरोंसे जगत् इस प्रकार भर गया जिस प्रकार कि मानो जिनेन्द्रदेवके गुणोंसे ही भर गया हो ॥६३॥ उस समय सौधर्म आदि देवोंसे घिरा हुआ वह विपुलाचल ऐसा सुशोभित हो रहा था जैसा कि पहले श्री ऋषभ जिनेन्द्रसे अधिष्ठित कैलास पर्वत सुशोभित होता था ॥६४॥ अथानन्तर देवोंने रत्नमयी ऐसे तीन कोट बनाये जिनकी चारों दिशाओं में एक-एक प्रमुख द्वार होनेसे बारह गोपुर थे ॥६५।। एक योजन विस्तारवाला समवसरण बनाया जिसमें आकाशस्फटिककी दीवालोंवाले बारह विभाग सुशोभित थे॥६६।। आठ प्रातिहार्यों और चौंतोस अतिशयोंसे सहित भगवान् उस समवसरणमें विराजमान हुए। वहाँ देवोंसे घिरे श्री वर्धमान ग्रहोंसे घिरे चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे ॥६७॥ इन्द्रभति, अग्निभति. वायभति तथा कौण्डिन्य आदि पण्डित इन्द्रकी प्रेरणासे श्री अरहन्तदेवके समवसरणमें आये ॥६८॥ वे सभी पण्डित अपने पाँच-पाँच सौ शिष्योंसे सहित थे तथा सभीने वस्त्रादिका सम्बन्ध त्यागकर संयम धारण कर लिया ॥६९।। उसी समय राजा चेटककी पुत्री चन्दना कुमारी, एक स्वच्छ वस्त्र धारण कर आर्यिकाओंमें प्रमुख हो गयो ।।७०॥ राजा श्रेणिक भी अपनी चतुरंगिणी सेनाके साथ समवसरणमें पहुंचा और वहाँ सिंहासनपर विराजमान श्रीवर्धमान जिनेन्द्रको उसने नमस्कार किया ।।७१॥ जिनेन्द्र भगवान्की वह समवसरण १. उत्तराफाल्गुनों प्राप्ते म. । २. विपुलगिरिनामानम् । ३. परितो म. । ४. कैलासपर्वतः । ५. महातिशयैः । Jain Education International ३ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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