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________________ हरिवंशपुराणे रुक्मिणः शिशुपालस्य भीष्मस्थ च हरिस्ततः । रुक्मिणीहरणोदन्तं दत्त्वा रथमचोदयत् ॥७८॥ पाञ्चजन्यमतो दध्मौ मुखरीकृतदिग्मुखम् । सुघोषं तु बलः शङ्ख चुक्षोभारिबलं ततः ॥७९॥ रुक्मी विदितवृत्तान्तः शिशुपालश्च सत्वरौ । धीरौ धीरौ परिप्राप्ती रथिनौ रथिनौ प्रति ॥८॥ रथैः षष्टिसहस्रस्तैः करिणामयुतेन च । त्रिभिः शतसहस्रश्च वाजिनां वायुरंहसाम् ॥४१॥ असिचक्रधनुःपाणिबहुलक्षपदातिभिः । ग्रसमानौ दिशो शेषा निकटत्वमुपागतौ ॥८२॥ अर्धासनसुखासीनां सान्वयन् मीष्मजा हरिः । ग्रामाकरसरःसिन्धुर्दर्शयन् प्रययौ शनैः ॥८३॥ अथ रौद्रं बलं प्राप्तमन्वीक्ष्य हरिणेक्षणा । रुक्मिण्युवाच भरिमपायपरिशङ्किनी ॥८॥ भ्राता मे कुपितः प्राप्तः संप्रत्येष' महारथः । शिशुपालश्च तन्नार्थ न मन्ये स्वन्तमात्मनः ॥८५॥ युवयोः पृथुसेनाभ्यामाभ्यां जाते महारणे । विजयं प्रति संशोतिरहो मे मन्दमाग्यता ॥८६॥ ब्रुवाणामिति तां शार्टी मा भैषीमदुमानसे । बहुत्वेन किमन्येषां मयि सत्ववति स्थिते ॥८७ ॥ इत्युक्त्वाऽसौ क्षुरप्रेण क्षिप्रमप्राकृतास्ववित् । अयस्नेनैव चिच्छेद तालवृक्षं पुरःस्थितम् ॥८॥ अङ्ग लीयकनद्धं च वज्रं संचूर्ण्य पाणिना । तस्याः संदेहमामूलं चिच्छेद यदुनन्दनः ॥४९॥ ततः सा प्राञ्जलिः प्राह प्रियसामर्थ्य वेदिनी । नाथ ! यस्नेन मे भ्राता रक्षणीयस्त्वयाहवे ॥१०॥ यास आये हुए श्रीकृष्णको सम्मुख कर दिया था ।।७७|| तदनन्तर श्रीकृष्णने रुक्मिणीके भाई रुक्मी, शिशुपाल और भीष्मको रुक्मिणीके हरणका समाचार देकर अपना रथ आगे बढ़ा दिया ॥७८।। उसी समय श्रीकृष्णने दिशाओंको मुखरित करनेवाला अपना पांचजन्य और बलदेवने अपना सुघोष नामका शंख फूंका जिससे शत्रुकी सेना क्षोभयुक्त हो गयी ।।७९।। समाचार मिलते ही रुक्मी और शिशुपाल दोनों धीर-वीर, बड़ी शीघ्रतासे रथोंपर सवार हो, धीर-वीर एवं रथोंपर सवार होकर जानेवाले कृष्ण और बलदेवका करनेके लिए पहुंचे ॥८०|| साठ हजार रथों. दश हजार हाथियों, वायके समान वेगशाली तीन लाख घोड़ों और खड्ग, चक्र, धनुष, हाथमें लिये कई लाख पैदल सिपाहियोंके द्वारा शेष दिशाओंको ग्रस्त करते हुए वे दोनों वीर निकटताको प्राप्त हुए ।।८१-८२।। इधर अर्धासनपर बैठी रुक्मिणीको सान्त्वना देते एवं ग्राम, खानें, सरोवर तथा नदियोंको दिखाते हुए श्रीकृष्ण धोरे-धीरे जा रहे थे ।।८३॥ तदनन्तर भयंकर सेनाको आयी देख मृगनयनी रुक्मिणी अनिष्टकी आशंका करती हुई स्वामीसे बोली कि 'हे नाथ ! क्रोधसे युक्त यह मेरा भाई महारथी रुक्मी और शिशुपाल अभी हाल आ रहे हैं इसलिए मैं अपना भला नहीं समझती ॥८४-८५॥ विशाल सेनासे युक्त इन दोनोंके साथ एकाकी आप दोनोंका महायद्ध होनेपर विजयमें सन्देह है। अहो! मैं बडी मन्द भाग्यवती हूँ' ॥८६-८७॥ इस प्रकार कहती हुई रुक्मिणीसे श्रीकृष्णने कहा कि 'हे कोमल हृदये ! भयभीत न हो, मुझ पराक्रमीके रहते हुए दूसरोंकी संख्या बहुत होनेपर भी क्या हो सकता है ?' इस प्रकार कहकर असाधारण अस्त्रके जाननेवाले श्रीकृष्णने अपने बाणसे सामने खड़े हुए तालवृक्षको अनायास ही काट डाला ॥८८॥ और अंगूठीमें जड़े हुए हीराको हाथसे चूर्ण कर उसके सन्देहको जड़-मूलसे नष्ट कर दिया ॥८९॥ तदनन्तर इन कार्योंसे पतिको शक्तिको जाननेवाली रुक्मिणीने हाथ जोड़कर कहा कि १. संप्रत्येव म.। २. सन्नाथ क.। ३. सप्ताशीतितमात् श्लोकादग्रे घ., ग., ङ., म. पुस्तकेषु निम्नाङ्किता श्लोको अधिकावुपलभ्यते। तयोक्तं मुनिरादेशः सप्ततालानजन पुमान । यश्छिनत्येकबाणेन स हरि न्यथा शुभे ॥१॥ तद्वचः शौरिणा श्रुत्वा क्रमेणाक्रम्य तत्स्थिरम् । स चिच्छेद क्षुरप्रेणाप्यनृ जुतालमण्डलीम् ।।२।। Jain Education International www.jainelibrary.org | For Private & Personal Use Only
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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