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________________ एकचत्वारिंशः सर्गः ५०१ स्वान्तःपुरगृहालीमिः प्रासादः परिवारितः । शुशुभे बलदेवस्य वाप्युधानादिभूषितः ॥२९॥ तत्प्रासादपुर-शसभामण्डपसन्निभः । श्रीसमामण्डपोऽमासीन्मार्तण्डकरखण्डनः ॥३०॥ उग्रसेनादिभपानां योग्या भवनकोटयः । साष्टकक्षान्तरास्तत्र सर्वेषामपि रेजिरे ॥३१॥ अशक्यवर्णनो दिव्यां बहुद्वारवतीं पुरीम् । निर्माय वासुदेवाय राजराजो न्यवेदयत् ॥३२॥ किरीटं वरहारं च कौस्तुभं पीतवाससी । भषानक्षत्रमालादि वस्तु लोके सुदुर्लभम् ॥३३॥ गदां कुमुद्वतीं शक्ति खड्ग नन्दकसंज्ञकम् । शाङ्ग धनुश्च तूणीरयुग्मं वज्रमयान् शरान् ॥३४॥ सर्वायुधयुतं दिव्यं रथं सगरुडध्वजम् । चामराणि सितच्छत्रं हरये धनदो ददौ ॥३५॥ मेचकं वस्त्रयुगलं मालां च मुकुट गदाम् । लाङ्गलं मुसलं चापं सशरं शरधिद्वयम् ॥३६॥ रथं दिव्यास्त्रसंपूर्णमच्चस्तालध्वजोर्जितम् । कुबेरः कामपालाय ददौ छत्रादिभिः सह ॥३७॥ भ्रातरोऽपि दशास्तेि वस्त्रामरणपूर्वकैः । संप्राप्तपूजनास्तेन मोजाद्याश्च नृपाः कृताः ॥३०॥ तीर्थकृत्पुनरन्यूनर्वयोयोग्यैः सुवस्तुमिः । प्राज्यैः पूजनमेवासौ किं तत्र बहुवर्णनैः ॥३९॥ प्रविशन्तु पुरी सर्वे भवन्त इति रैपतिः । तानुक्त्वा पूर्णभद्रं च संदिश्यांन्तर्हितः क्षणात् ॥४०॥ ततो यादवसङ्घास्तावमिषिच्याम्बुधेस्तटे । जयशब्देन संघुष्य हृष्टा हलगदाधरौ ॥४१॥ विविशुभरिकां भूत्या चतुरङ्गबलान्विताः । सप्रजाः कृतपुण्यास्ते प्राप्तां दिवमिव स्वयम् ॥४२॥ पूर्णमद्रोपदिष्टेषु भद्रेपु मवनेष्वमी। यथायथं सुखं तस्थुः प्रजाश्च निजसंस्थया ॥४३॥ आश्रय कर चारों ओर सुशोभित हो रही थीं ॥२८॥ अन्तःपुरके घरोंकी पंक्तियोंसे घिरा एवं वापिका तथा बगीचा आदिसे विभूषित बलदेवका भवन सुशोभित हो रहा था ॥२९॥ बलदेवके महलके आगे एक सभामण्डप सशोभित था जो इन्द्र के सभामण्डपके समान था और दीप्तिसे सूर्यको किरणोंका खण्डन करनेवाला था ।।३०॥ उस नगरीमें उग्रसेन आदि सभी राजाओंके योग्य महलोंकी पंक्तियाँ सुशोभित थीं जो आठ-आठ खण्डकी थीं ॥३१॥ जिसका वर्णन करना शक्य नहीं था तथा जो अनेक द्वारोंसे युक्त थी ऐसी सुन्दर नगरीकी रचना कर कुबेरने श्रीकृष्णसे निवेदन किया अर्थात् नगरो रची जानेकी सूचना श्रीकृष्णको दी ॥३२॥ उसी समय कुबेरने श्रीकृष्णके लिए मुकुट, उत्तम हार, कौस्तुभमणि, दो पीत-वस्त्र, लोकमें अत्यन्त दुर्लभ नक्षत्रमाला आदि आभूषण, कुमुदती नामकी गदा, शक्ति, नन्दक नामका खड्ग, शाङ्ग नामका धनुष, दो तरकश, वज्रमय बाण, सब प्रकारके शस्त्रोंसे युक्त एवं गरुड़की ध्वजासे युक्त दिव्य रथ, चमर और श्वेत छत्र प्रदान किये ॥३३-३५|| साथ ही बलदेवके लिए दो नील-वस्त्र, मकूट, गदा, हल, मसल, धनुष-बाणोंसे यक्त दो तरकश, दिव्य अस्त्रोंसे परिपूर्ण एवं तालको ऊंची ध्वजासे सबल रथ और छत्र आदि दिये ॥३६-३७|| समुद्रविजय आदि दसों भाई तथा भोज आदि राजाओंका भी कुबेरने वस्त्र, आभरण आदिके द्वारा खूब सत्कार किया ॥३८॥ श्री नेमिनाथ तीर्थंकर अपनी अवस्थाके योग्य उत्तमोत्तम वस्तुओंके द्वारा पूजाको प्राप्त हुए ही थे। इस विषयका अधिक वर्णन करनेसे क्या प्रयोजन है ? ॥३९॥ 'आप सब लोग नगरीमें प्रवेश करें' इस प्रकार सबसे कहकर और पूर्णभद्र नामक यक्षको सन्देश देकर कुबेर क्षणभरमें अन्तहित हो गया ॥४०॥ तदनन्तर यादवोंके संघने समुद्रके तटपर श्रीकृष्ण और बलदेवका अभिषेक कर हर्षित हो उनकी जयजयकार घोषित की ॥४१|| तत्पश्चात् जिन्होंने पुण्यका संचय किया था ऐसे श्रीकृष्ण आदिने चतुरंग सेना और समस्त प्रजाके साथ, प्राप्त हुए स्वर्गके समान उस द्वारिकापुरीमें बड़े वैभवसे प्रवेश किया ॥४२॥ पूर्णभद्र यक्षके द्वारा बतलाये हुए मंगलमय भवनोंमें प्रजाके १. अष्टखगाः ( ग. टि.)। २. कुबेरः। ३. बलभद्राय । ४. कुबेरः । ५. यथा स्वेच्छं म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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