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________________ ४८४ हरिवंशपुराणे 3 विधाय से सुरद्विपस्फटिकभूभृतो मस्तके जिनेन्द्र शिशुमिन्द्रनीलमणितुङ्गचूडामणिम् । चचाल चलचामरातपनिवारणोच्चैरुचिश्चलोर्मिकुलसंकुलो जलनिधिर्यथा फेनिलः ॥ ४२ ॥ सुरेभवदनत्रिके दशगुणे द्वयोश्चाष्ट ते रदाः प्रतिरदं सरः सरसि पद्मिनी तत्र च । मवन्ति मुखसंख्यया सहितपद्मपत्राण्यपि प्रशस्तरसभाविता प्रतिदलं नटस्यप्सराः ॥ ४३ ॥ तथाविधविभूतिभिः समुपगम्य मेरुं सुराः परीत्य पृथु पाण्डुकाख्यवनखण्डमभ्येत्य ते । जिनेन्द्र मतिरुद्वपाण्डुक शिलातले कोमले सुपञ्चशतकार्मुको च्चहरिविष्टरेऽतिष्ठपन् ॥४४॥ ततश्च धृतपूजनोपकरणेषु देवाङ्गनागणेषु परितः स्थितेष्व भिनवोत्सवानन्दिषु । सुकुतपोरकटप्रकटनाटकेषु स्फुटप्रकृष्टरस मात्र हावलयरञ्जितस्त्रर्गिषु ॥४५॥ रटत्पटहशङ्खशब्दहरिनादभेरीरवै गिरीन्द्र सुबृहद्गुहाप्रतिनिनादसंवर्धितः । दिगन्तर विसर्पिभिर्जिनगुणैरिव प्रस्फुटैरशेषभुवनोदरे श्रुतिसुखावहैः पूरिते ॥ ४६ ॥ नभस्तल मितस्ततः स्थगयति स्फुरत्सौरभे विचित्रपटवाल धूप पटले सुपुष्पोत्करे । सुगन्धयति बन्धुरे परमगन्धहृद्ये दिशां मुखानि मुखपाण्डुकप्रमवमातरिश्वन्यलम् ॥४७॥ गृहीत बहुविग्रहः सुरपरिग्रहो वासवः समारभत भक्तितो जिनमहाभिषेकं स्वयम् । विधातुममराहृतैस्तु मणिहेमकुम्भच्युतैः पयोमयपयोनिधेः शुभपयोभिरुद्गन्धिमिः ॥ ४८ ॥ [ चतुर्भिः कलापकम् ] की यों बनी रही ||४१ || वह इन्द्र जिनके मस्तकपर इन्द्रनील मणिका ऊँचा चूड़ामणि सुशोभित हो रहा था, ऐसे जिन - बालकको ऐरावत हाथीरूपी स्फटिकमय पर्वतके मस्तकपर विराजमान कर चला । उस समय वह इन्द्र चंचल चामर और छत्रोंसे अतिशय शोभायमान था और उनसे ऐसा जान पढ़ता था मानो चंचल तरंगोंके समूहसे युक्त फेनसे भरा समुद्र ही चला जा रहा हो ॥४२॥ ऐरावत हाथीके बत्तीस मुख थे, प्रत्येक मुखमें आठ-आठ दाँत थे, प्रत्येक दांतपर एक-एक सरोवर था, प्रत्येक सरोवरमें एक-एक कमलिनी थी, एक-एक कमलिनी में बत्तीस-बत्तीस पत्र थे और एक-एक पत्रपर उत्तम रससे भरी हुई एक-एक अप्सरा नृत्य कर रही थी ||४३|| उस प्रकारकी लोकोत्तर विभूतिके साथ देव लोग मेरु पर्वत के समीप पहुंचे तथा उसकी परिक्रमा देकर पाण्डुक नामक विशाल वनखण्ड में प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने विशाल पाण्डुकशिलाके ऊपर जो पांच सौ धनुष ऊंचा सिंहासन है उसपर जिन बालकको विराजमान किया ॥ ४४ ॥ तदनन्तर पूजाके उपकरणोंको धारण करनेवाले एवं नवीन उत्सवसे आनन्दित देवांग - नाओंके समूह जब चारों ओर खड़े थे, स्पष्ट तथा श्रेष्ठ रस, भाव, हाव और लयसे देवोंको अनुरंजित करनेवाले श्रेष्ठ नृत्यकारोंके समूह जब नृत्य कर रहे थे, सुमेरु पर्वतकी सुविशाल गुफाओं गूंजने वाली प्रतिध्वनिसे वृद्धिगत, दिशाओंके अन्तरालमें फैलनेवाले, जिनेन्द्र भगवान्के गुणोंके समान अत्यन्त प्रकट, एवं कानोंको सुख देनेवाले बजते हुए नगाड़ों और शंखोंके शब्द तथा सिंहनाद और भेरियोंकी ध्वनियोंसे जब संसारका मध्यभाग परिपूर्ण हो रहा था, प्रकट होती हुई सुगन्धिसे युक्त, नाना प्रकारके पटवास, धूपोंके समूह और उत्तमोत्तम पुष्पोंके समूह जब इधर-उधर आकाशतलको व्याप्त कर रहे थे, और मुखरूपी पाण्डुक वनसे उत्पन्न उत्कृष्ट गन्धसे हृदयको प्रिय लगनेवाली सुन्दर वायु जब दिशाओंके मुखको अत्यन्त सुगन्धित कर रहो १. चूलार्माण क, ख, ग । २. भाविताः म. ग. । ३. नटन्त्यप्सराः म, ग. । ४, मतिरुद्र म. । ५. नाटक पेटकः (ग. टि. ) 1 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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