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________________ सप्तत्रिशः सर्गः ४७५ حی یا جی یا مح به جدی यदैक्षि लक्ष्मीरभिषेकिणी ततः प्रसूतमात्रस्य गिरीन्द्रमस्तके । सुरासुरेन्द्रर्दयितेऽभिषिच्यते गिरिस्थिरः क्षीरसमुद्रवारिभिः ॥३०॥ स्रजोः सुगन्धायतयोः प्रदर्शनाजगत्त्रयव्यापियशाः सुगन्धिमा । निरन्तरं लोकमलोकमप्यसावनन्तदृग्ज्ञानदृशा तनिष्यति ॥३१॥ स चन्द्रसंदर्शनतः सुदर्शने 'महादयाचन्द्रिकया सुदर्शनः । जिनेन्द्रचन्द्र जगतां तमोऽन्तकृन्निरन्तरालादकरो भविष्यति ॥३२॥ समस्ततेजस्विजनस्य भूयसा निजेन तेजांसि विजित्य तेजसा । जगन्ति तेजोनिधिरर्कदर्शनाकरिष्यति ध्वस्ततमांसि ते सुतः ॥३३॥ सुखं कृतक्रीडझषद्वयक्षणादवाप्य सौख्यं विषयोपभोगजम् । अनन्तमन्ते सुखमाप्स्यति ध्र शिवालयेऽसौ शिवदेवि! नन्दनः ॥३४॥ सुपूर्णकुम्भद्वयदर्शनात्ततो गृहं प्रपूर्ण निधिमिर्भविष्यति।। जगन्मुदापूर्णमनोरथस्य हि प्रभावतस्तस्य शरीरजस्य ते ॥३५॥ विचित्रपुष्पाम्बुजखण्डदर्शनादशेषसल्लक्षणलक्षितः सुतः । विदाहितृष्णातृषितान्वितृष्णधीरिहैव निर्वाणमयान् करिष्यति ॥३६॥ महासमुद्रस्य महामृतात्मनः समुद्रगम्भीरमतिर्विलोकनात् । श्रताम्बुधि नीतिमहासरिद्वितं स पाययिष्यत्युपदेशकृजनान् ॥३०॥ सुरत्नसिंहासनदर्शनेन स स्फुरन्मणिद्योतितिरीटपाणिभिः । परीतमारोक्ष्यति देवदानवैः पराय॑सिंहासनमूर्ध्वशासनः ॥३८॥ करेगा ।।२९॥ हे वल्लभे ! जो तूने अभिषेकसे युक्त लक्ष्मी देखी है उसका फल यह है कि उत्पन्न होते ही तेरे पुत्रका सुरेन्द्र और असुरेन्द्र सुमेरु पर्वतके मस्तकपर क्षीरसागरके जलसे अभिषेक करेंगे और वह पर्वतके समान स्थिर होगा ॥३०॥ सुगन्धित मालाओंके देखनेसे यह सूचित होता है कि वह पुत्र तीनों जगत्में व्याप्त यशसे सहित होगा, उत्तम सुगन्धिको प्राप्त गा और अपने अनन्तज्ञान तथा अनन्तदर्शनरूपो दष्टिके द्वारा समस्त लोक और अलोकको भी व्याप्त करेगा ॥३१॥ हे सुन्दरि ! चन्द्रमाके देखनेसे वह जिनेन्द्र चन्द्र, अत्यधिक दयारूपी चन्द्रिकासे सुन्दर होगा, जगत्के अज्ञानरूपी अन्धकारको नष्ट करनेवाला होगा और समस्त जगत्के निरन्तर आह्लादको करनेवाला होगा ॥३२।। सूर्यके देखनेसे तेरा वह पुत्र तेजका भाण्डार होगा, और अपने बहुत भारी तेजके द्वारा समस्त तेजस्वी जनोंके तेजको जीतकर तीनों लोकोंको अन्धकारसे रहित करेगा॥३३।। हे शिव देवि ! सुखसे क्रीड़ा करती हुई मछलियोंका युगल देखनेसे यह सूचित होता है कि तुम्हारा पुत्र विषयोंके उपभोगसे उत्पन्न सुखको पाकर अन्तमें मोक्षके अनन्त सुखको अवश्य ही प्राप्त होगा ॥३४॥ सुवर्ण कलशोंका युगल देखनेसे यह सिद्ध होता है कि तुम्हारा पुत्र हर्षपूर्वक जगत्के मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला होगा और उसके प्रभावसे यह घर निधियोंसे परिपूर्ण हो जायेगा ।।३५।। नाना प्रकारके पुष्पोंसे युक्त कमल सरोवरके देखनेसे तुम्हारा वह पुत्र समस्त उत्तम लक्षणोंसे युक्त होगा, तृष्णारहित बुद्धि का धारक होगा और अत्यधिक दाह उत्पन्न करनेवाली तृष्णारूपी प्याससे पीड़ित मनुष्योंको इसी संसारमें सन्तोषसे युक्त-सुखी करेगा ॥३६।। अमृतमय महासागरके देखनेसे यह सूचित होता है कि तुम्हारा पुत्र समुद्रके समान गम्भीर बुद्धिका धारक होगा, तथा उपदेश देकर जगत्के जीवोंको कीर्तिरूपी महानदियोंसे परिपूर्ण श्रुतज्ञानरूपो सागरका पान करायेगा ॥३७॥ उत्तम रत्नोंसे जटित सिंहासन देखनेसे यह प्रकट १. महोदयाचन्द्रिकया म. । महोदयचन्द्रिकया ग. । २. विषयोपयोगजं म. । ३. श्रुताम्बुधिर्नीति म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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